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Rigveda / 10 / 34 / 10

जा॒या त॑प्यते कित॒वस्य॑ ही॒ना मा॒ता पु॒त्रस्य॒ चर॑त॒: क्व॑ स्वित् । ऋ॒णा॒वा बिभ्य॒द्धन॑मि॒च्छमा॑नो॒ऽन्येषा॒मस्त॒मुप॒ नक्त॑मेति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 34 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकितवनिन्दा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : जा॒या । त॒प्य॒ते॒ । कित॒वस्य॑ । ही॒ना । मा॒ता । पु॒त्रस्य॑ । चर॑तः । क्व॑ । स्वि॒त् । ऋ॒ण॒ऽवा । बि॒भ्य॒त् । धन॑म् । इ॒च्छमा॑नः । अ॒न्येषा॑म् । अस्त॑म् । उप॑ । नक्त॑म् । ए॒ति॒ ॥ १०.३४.१०

पदार्थ : (कितवस्य हीना जाया तप्यते) जुआरी की पत्नी धन-आभूषण से क्षीण हुई सन्तप्त रहती है (क्व स्वित्-चरतः पुत्रस्य माता) कहीं-कहीं इधर-उधर भटकते हुए जुआरी पुत्र की माता भी सन्तप्त रहती है, (ऋणावा बिभ्यत्) ऋणी होकर ऋण देनेवाले से डरता रहता है, (धनम्-इच्छमानः) धन को चाहता हुआ (अन्येषाम्-अस्तं नक्तम्-उप-एति) दूसरों के घर रात्रि में चोरी करने चला जाता है, यह जुआरी की दुर्दशा होती है ॥१०॥

भावार्थ : जुआरी के घर में पत्नी भी दुःखी रहती है। स्वयं भी वह ऋण देनेवाले से भय खाये रहता है। दुखी होकर के घरों में चोरी करने लगता है। यह दुर्दशा जुआ खेलने से होती है ॥१०॥