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Rigveda / 10 / 34 / 11

स्त्रियं॑ दृ॒ष्ट्वाय॑ कित॒वं त॑तापा॒न्येषां॑ जा॒यां सुकृ॑तं च॒ योनि॑म् । पू॒र्वा॒ह्णे अश्वा॑न्युयु॒जे हि ब॒भ्रून्त्सो अ॒ग्नेरन्ते॑ वृष॒लः प॑पाद ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 34 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : कवष ऐलूष अक्षो वा मौजवान् | देवता : अक्षकितवनिन्दा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स्त्रिय॑म् । दृ॒ष्ट्वाय॑ । कि॒त॒वम् । त॒ता॒प॒ । अ॒न्येषा॑म् । जा॒याम् । सुऽकृ॑तम् । च॒ । योनि॑म् । पू॒र्वा॒ह्णे । अश्वा॑न् । यु॒यु॒जे । हि । ब॒भ्रून् । सः । अ॒ग्नेः । अन्ते॑ । वृ॒ष॒लः । प॒पा॒द॒ ॥ १०.३४.११

पदार्थ : (कितवम्) जुआरी मनुष्य (स्त्रियं दृष्ट्वाय) अपनी दुःखित स्त्री को देखकर (अन्येषां जायां सुकृतं योनिं च) अन्य जनों की सुखयुक्त पत्नी को और सुशोभित घर को देखकर (तताप) पीड़ित होता है (पूर्वाह्णे बभ्रून्-अश्वान् युयुजे) प्रातः ही पोषक इन्द्रियप्राणों से युक्त होता है, सावधान होता है, तो (सः वृषलः-अग्नेः-अन्ते पपाद) वह धर्म का लोप करनेवाला जुआरी शोकार्त हुआ परमात्मा की शरण में जाता है ॥११॥

भावार्थ : जुआरी जुए के परिणाम से अपने पत्नी को दुखी देखता हुआ और दरिद्रता का अनुभव करता हुआ तथा अन्यों की पत्नी और घरों को सुखी सम्पन्न पाता हुआ पश्चात्ताप करता है, तो रात्रि के पश्चात् प्रातः सावधान हुआ अपने उत्थानार्थ परमात्मा का स्मरण करता है ॥११॥