Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 35 / 7

श्रेष्ठं॑ नो अ॒द्य स॑वित॒र्वरे॑ण्यं भा॒गमा सु॑व॒ स हि र॑त्न॒धा असि॑ । रा॒यो जनि॑त्रीं धि॒षणा॒मुप॑ ब्रुवे स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 35 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : लुशो धानाकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : श्रेष्ठ॑म् । नः॒ । अ॒द्य । स॒वि॒तः॒ । वरे॑ण्यम् । भा॒गम् । आ । सु॒व॒ । सः । हि । र॒त्न॒ऽधाः । असि॑ । रा॒यः । जनि॑त्रीन् । धि॒षणा॑म् । उप॑ । ब्रु॒वे॒ । स्व॒स्ति । अ॒ग्निम् । स॒म्ऽइ॒धा॒नम् । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.३५.७

पदार्थ : (सवितः) हे प्रेरक परमात्मन् ! तू (अद्य) इस जन्म में हमारे लिए (नः) श्रेष्ठ करनेवाले योग्य अध्यात्म सुखलाभ मोक्ष को प्राप्त करा (सः-हि रत्नधाः-असि) वह तू ही रमणीय धनों या सुखों का अत्यन्त धारक और देनेवाला है। (रायः जनित्रीं धिषणाम्) रमणीय धन भोग की सम्पन्न करानेवाली वाणी को (उप ब्रुवे) उपासनारूप में प्रस्तुत करता हूँ ॥७॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना से वह सर्वश्रेष्ठ मोक्षसुख और सांसारिक सच्चे सुख को ही प्रदान करता है ॥७॥