Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 35 / 8

पिप॑र्तु मा॒ तदृ॒तस्य॑ प्र॒वाच॑नं दे॒वानां॒ यन्म॑नु॒ष्या॒३॒॑ अम॑न्महि । विश्वा॒ इदु॒स्राः स्पळुदे॑ति॒ सूर्य॑: स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 35 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : लुशो धानाकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : पिप॑र्तु । मा॒ । तत् । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒ऽवाच॑नम् । दे॒वाना॑म् । यत् । म॒नु॒ष्याः॑ । अम॑न्महि । विश्वाः॑ । इत् । उ॒स्राः । स्पट् । उत् । ए॒ति॒ । सूर्यः॑ । स्व॒स्ति । अ॒ग्निम् । स॒म्ऽइ॒धा॒नम् । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.३५.८

पदार्थ : (देवानां यत्-ऋतस्य प्रवाचनम्) सृष्टि के आदि में अग्नि आदि परम ऋषियों का जो प्रवचन करने योग्य वेदज्ञान जिसका है, उन ऋषियों द्वारा उनका प्रवचन परमात्मा कराता है (मनुष्याः-अमन्महि) हम मनुष्य चाहते हैं (तत्-मा पिपर्तु) वह मेरी रक्षा करे (सूर्यः) वह विद्यासूर्य परमात्मा (विश्वाः-उस्राः-इत् स्पट्-उदेति) सारी विद्या-धाराओं को ही जानता हुआ ऋषियों के अन्दर साक्षात् होता है ॥८॥

भावार्थ : समस्तविद्याप्रकाशक परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में अग्नि आदि परम ऋषियों को उनके अन्दर साक्षात् वेदज्ञान का उपदेश मनुष्यों के कल्याणार्थ देता है ॥८॥