Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 45 / 9

यस्ते॑ अ॒द्य कृ॒णव॑द्भद्रशोचेऽपू॒पं दे॑व घृ॒तव॑न्तमग्ने । प्र तं न॑य प्रत॒रं वस्यो॒ अच्छा॒भि सु॒म्नं दे॒वभ॑क्तं यविष्ठ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 45 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । ते॒ । अ॒द्य । कृ॒णव॑त् । भ॒द्र॒ऽशो॒चे॒ । अ॒पू॒पम् । दे॒व॒ । घृ॒तऽव॑न्तम् । अ॒ग्ने॒ । प्र । तम् । न॒य॒ । प्र॒ऽत॒रम् । वस्यः॑ । अच्छ॑ । अ॒भि । सु॒म्नम् । दे॒वऽभ॑क्तम् । य॒वि॒ष्ठ॒ ॥ १०.४५.९

पदार्थ : (भद्रशोचे यविष्ठ देव-अग्ने) हे कल्याणदीप्तिवाले ! अत्यन्तसङ्गमनीय ! परमात्मदेव ! (ते) तेरे लिए (अद्य) इस वर्तमान काल में या जीवन में (यः) जो उपासक (घृतवन्तम्-अपूपं कृणवत्) संयम द्वारा इन्द्रियगण को तेजस्वी बनाता है (तं प्रतरं वस्यः-अभि-अच्छ सुम्नं देवभक्तं प्र नय) उस उपासक जन को प्रकृष्टतर, श्रेष्ठ, अत्यन्त बसनेवाला, प्रशंसनीय, धनैश्वर्यरूप, मुमुक्षुओं के द्वारा भजनीय सुखविशेष-मोक्ष के प्रति प्रेरित कर-ले जा ॥९॥

भावार्थ : परमात्मा का ज्ञानप्रकाश कल्याणकारी है, वह समागम के योग्य है। जो उपासक संयम द्वारा अपनी इन्द्रियों को तेजस्वी बना लेता है, उसे परमात्मा सांसारिक सुख भोगों से उत्कृष्ट सुखविशेषरूप मोक्ष को प्राप्त कराता है ॥९॥