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Rigveda / 10 / 45 / 10

आ तं भ॑ज सौश्रव॒सेष्व॑ग्न उ॒क्थौ॑क्थ॒ आ भ॑ज श॒स्यमा॑ने । प्रि॒यः सूर्ये॑ प्रि॒यो अ॒ग्ना भ॑वा॒त्युज्जा॒तेन॑ भि॒नद॒दुज्जनि॑त्वैः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 45 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वत्सप्रिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आ । तम् । भ॒ज॒ । सौ॒श्र॒वसेषु॑ । अ॒ग्ने॒ । उ॒क्थेऽउ॑क्थे । आ । भ॒ज॒ । श॒स्यमा॑ने । प्रि॒यः । सूर्ये॑ । प्रि॒यः । अ॒ग्ना । भ॒वा॒ति॒ । उत् । जा॒तेन॑ । भि॒नद॑त् । उत् । जनि॑ऽत्वैः ॥ १०.४५.१०

पदार्थ : (अग्ने) हे ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! तू (तं सौश्रवसेषु-आ भज) उस  इस संयमी को शोभन श्रवण-वेदश्रवण में होनेवाले श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार में इनके सेवन करने पर स्वीकार कर-चाहना कर (शस्यमाने-उक्थे-उक्थे आ भज) प्रस्तूयमान अर्थात् स्तुत किये जाते हुए-समर्पित किये जाते हुए प्रत्येक वचन में स्वीकार कर (सूर्ये प्रियः-अग्ना प्रियः-भवाति ) वह सूर्यरूप सर्वप्रकाशक तुझ में-तेरी दृष्टि में प्यारा होवे, तुझ अग्रनेता में तेरी दृष्टि में प्रिय होवे (जातेन-उत् भिनदत्-जनित्वेन-उत्) हुए पापकर्म से सम्पर्करहित हो तथा होनेवाले पापकर्म से भी सम्पर्करहित हो ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा का जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार करता है तथा उसकी स्तुति करने में लगा रहता है, वह सर्वप्रकाशक, अग्रनेता परमात्मा का प्रिय हो जाता है। वह किसी भी काल में पापकर्म नहीं करता है, पापकर्म के दुःख को नहीं भोगता है ॥१०॥