Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 63 / 14

यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं शूर॑साता मरुतो हि॒ते धने॑ । प्रा॒त॒र्यावा॑णं॒ रथ॑मिन्द्र सान॒सिमरि॑ष्यन्त॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 63 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : यम् । दे॒वा॒सः॒ । अव॑थ । वाज॑ऽसातौ । यम् । शूर॑ऽसाता । म॒रु॒तः॒ । हि॒ते । धने॑ । प्रा॒तः॒ऽयावा॑नम् । रथ॑म् । इ॒न्द्र॒ । सा॒न॒सिम् । अरि॑ष्यन्तम् । आ । रु॒हे॒म॒ । स्व॒स्तये॑ ॥ १०.६३.१४

पदार्थ : (मरुतः-देवासः) हे जीवन्मुक्त विद्वानों ! (यं वाजसातौ) जिसको अमृतभोगप्राप्ति के निमित्त (यं शूरसाता) जिसको पापनाशनार्थ प्राप्ति के हेतु (हिते धने) हितकर अध्यात्मधन के निमित्त (अवथ) सुरक्षित रखते हो (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (प्रातर्यावाणं रथम्) जीवन के प्रातः अर्थात् ब्रह्मचर्य से चलने की शक्तिवाले रमणीय (सानसिम्) शाश्वत सुखरूप (अरिष्यन्तम्) हिंसित न होनेवाले मोक्षधाम को (स्वस्तये-आरुहेम) कल्याण के लिए आरोहण करें-प्राप्त होवें ॥१४॥

भावार्थ : जीवन्मुक्त विद्वानों के सङ्ग से अमृत अन्न भोग प्राप्ति और पापरहित शुद्ध वृत्ति सम्पादन के लिए उपदेश ग्रहण करना चाहिए। उससे परमात्मा पूर्ण ब्रह्मचर्य से सम्पन्न को मुक्तिसुख प्रदान करता है ॥१४॥