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Rigveda / 10 / 63 / 15

स्व॒स्ति न॑: प॒थ्या॑सु॒ धन्व॑सु स्व॒स्त्य१॒॑प्सु वृ॒जने॒ स्व॑र्वति । स्व॒स्ति न॑: पुत्रकृ॒थेषु॒ योनि॑षु स्व॒स्ति रा॒ये म॑रुतो दधातन ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 63 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : पथ्यास्वस्तिः | छन्द : जगती त्रिष्टुप् वा | स्वर : निषादो धैवतो वा

विषय :

पदपाठ : स्व॒स्ति । नः॒ । प॒थ्या॑सु । धन्व॑ऽसु । स्व॒स्ति । अ॒प्ऽसु । वृ॒जने॑ । स्वः॑ऽवति । स्व॒स्ति । नः॒ । पु॒त्र॒ऽकृ॒थेषु॑ । योनि॑षु । स्व॒स्ति । रा॒ये । म॒रु॒तः॒ । द॒धा॒त॒न॒ ॥ १०.६३.१५

पदार्थ : (मरुतः) हे जीवन्मुक्त विद्वानों ! (नः स्वस्ति पथ्यासु धन्वसु) हमारे लिए स्वस्ति-कल्याण हो मार्ग में आनेवाले मरुप्रदेशों में (स्वस्ति अप्सु) जलप्रदेशों में कल्याण हो (स्वर्वति वृजने) सुखवाले दुःखवर्जित मोक्ष में कल्याण हो (पुत्रकृथेषु योनिषु नः स्वस्ति) सन्तानकर्मों में और गृहों में कल्याण हो (स्वस्ति राये दधातन) धन प्राप्त करने में कल्याण हो ॥१५॥

भावार्थ : जीवन्मुक्त विद्वानों के शिक्षण से अपने मार्गों में आये मरुस्थलों, जलस्थलों, सन्तानोत्पत्तिवाले गृहस्थलों, धनप्रसङ्गों, दुःखरहित मोक्षों को सुखमय बनाना चाहिए ॥१५॥