Rigveda / 10 / 66 / 9
द्यावा॑पृथि॒वी ज॑नयन्न॒भि व्र॒ताप॒ ओष॑धीर्व॒निना॑नि य॒ज्ञिया॑ । अ॒न्तरि॑क्षं॒ स्व१॒॑रा प॑प्रुरू॒तये॒ वशं॑ दे॒वास॑स्त॒न्वी॒३॒॑ नि मा॑मृजुः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 66 | Mantra No : 9
In English:
Seer : vasukarNo vaasukraH | Devta : vishvedevaa: | Metre : paadanichRRijjgatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : dyaavaapRRithivii janayannabhi vrataapa oShadhiirvaninaani yaj~niyaa . antarikSha.m sva1raa papruruutaye vasha.m devaasastanvii3 ni maamRRijuH .
Component Words : dyaavaapRRithivii iti . janayan . abhi . vrataa . aapaH . oShadhiiH . vaninaani . yaj~niyaa . antarikSham . svaH . aa . papruH . uutaye . vasham . devaasaH . tanvi . ni . mamRRijuH . 10.66.9
In Hindi:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । ज॒न॒य॒न् । अ॒भि । व्र॒ता । आपः॑ । ओष॑धीः । व॒निना॑नि । य॒ज्ञिया॑ । अ॒न्तरि॑क्षम् । स्वः॑ । आ । प॒प्रुः॒ । ऊ॒तये॑ । वश॑म् । दे॒वासः॑ । त॒न्वि॑ । नि । म॒मृ॒जुः॒ ॥ १०.६६.९
पदार्थ : (देवासः) विद्वान् (ओषधीः-यज्ञिया-वनिनानि) गोधूम-गेहूँ आदि ओषधियों तथा वन में होनेवाले श्रेष्ठ फलों को (जनयन्) उत्पन्न करते हुए-उसके हेतु (द्यावापृथिवी स्वः-अन्तरिक्षम्-आपप्रुः) यज्ञ से द्युलोक, पृथिवीलोक और आकाश को सुख जिससे हो, ऐसे पूर्ण करें (ऊतये) रक्षा के लिए (तन्वि वशं निममृजुः) अपने शरीर में कमनीय सुख और निर्दोष निर्मल विचारों को करें-सम्पादित करें ॥९॥
भावार्थ : विद्वानों को चाहिए कृषि और उद्यानों में गोधूम आदि अन्नों और विविध फलों को पुष्ट मधुररूप से उत्पन्न करें तथा उनके द्वारा यज्ञों को रचाकर स्वास्थ्य प्राप्त करें और जनता के स्वास्थ्य को सम्पन्न करें, निर्मल विशुद्ध विचारों का प्रचार करें ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः
पदपाठ : द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । ज॒न॒य॒न् । अ॒भि । व्र॒ता । आपः॑ । ओष॑धीः । व॒निना॑नि । य॒ज्ञिया॑ । अ॒न्तरि॑क्षम् । स्वः॑ । आ । प॒प्रुः॒ । ऊ॒तये॑ । वश॑म् । दे॒वासः॑ । त॒न्वि॑ । नि । म॒मृ॒जुः॒ ॥ १०.६६.९
भावार्थ :