Rigveda / 10 / 66 / 10
ध॒र्तारो॑ दि॒व ऋ॒भव॑: सु॒हस्ता॑ वातापर्ज॒न्या म॑हि॒षस्य॑ तन्य॒तोः । आप॒ ओष॑धी॒: प्र ति॑रन्तु नो॒ गिरो॒ भगो॑ रा॒तिर्वा॒जिनो॑ यन्तु मे॒ हव॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 66 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vasukarNo vaasukraH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : dhartaaro diva RRIbhavaH suhastaa vaataaparjanyaa mahiShasya tanyatoH . aapa oShadhiiH pra tirantu no giro bhago raatirvaajino yantu me havam .
Component Words : dhartaaraH . divaH . RRIbhavaH . su.ahastaaH . vaataaparjanyaa . mahiShasya . tanyatoH . aapaH . oShadhiiH . pra . tirantu . naH . giraH . bhagaH . raatiH . vaajinaH . yantu . me . havam . 10.66.10
In Hindi:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : ध॒र्तारः॑ । दि॒वः । ऋ॒भवः॑ । सु॒ऽहस्ताः॑ । वा॒ता॒प॒र्ज॒न्या । म॒हि॒षस्य॑ । त॒न्य॒तोः । आपः॑ । ओष॑धीः । प्र । ति॒र॒न्तु॒ । नः॒ । गिरः॒ । भगः॑ । रा॒तिः । वा॒जिनः॑ । य॒न्तु॒ । मे॒ । हव॑म् ॥ १०.६६.१०
पदार्थ : (महिषस्य तन्यतोः) महान् प्रकाश के विस्तार करनेवाले परमात्मा या सूर्य का (दिवः-धर्तारः) द्युलोक-प्रकाश के धारक (सुहस्ताः-ऋभवः) उत्तम हाथवाले शिल्पियों की भाँति किरणें और (वातापर्जन्या) शोभन हस्तक्रियावाले शिल्पियों की भाँति वायु और मेघ (ओषधीः-प्रतिरन्तु) ओषधिकों को बढ़ाते हैं (नः गिरः) हमारी वाणियों के प्रति (भगः-रातिः) भजनीय परमात्मा सुखदाता (वाजिनः) ज्ञानवान् विद्वान् और ऋत्विज (मे हवं हन्तु) मेरी प्रार्थना को पूरा करें ॥१०॥
भावार्थ : महान् ज्ञानप्रकाशवाले परमात्मा की ज्ञानरश्मियाँ तथा सूर्य की प्रकाशरश्मियाँ एवं वायु और मेघ शिल्पियों की भाँति ओषधियों के सम्पादन में समर्थ हैं तथा ज्ञानी जन हमारी प्रार्थना को सुनते हैं-स्वीकार करते हैं ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : ध॒र्तारः॑ । दि॒वः । ऋ॒भवः॑ । सु॒ऽहस्ताः॑ । वा॒ता॒प॒र्ज॒न्या । म॒हि॒षस्य॑ । त॒न्य॒तोः । आपः॑ । ओष॑धीः । प्र । ति॒र॒न्तु॒ । नः॒ । गिरः॒ । भगः॑ । रा॒तिः । वा॒जिनः॑ । य॒न्तु॒ । मे॒ । हव॑म् ॥ १०.६६.१०
भावार्थ :