Rigveda / 10 / 93 / 8
ऋ॒भुॠ॑भु॒क्षा ऋ॒भुर्वि॑ध॒तो मद॒ आ ते॒ हरी॑ जूजुवा॒नस्य॑ वा॒जिना॑ । दु॒ष्टरं॒ यस्य॒ साम॑ चि॒दृध॑ग्य॒ज्ञो न मानु॑षः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 93 | Mantra No : 8
In English:
Seer : taanvaH paarthyaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : aastaarapa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : RRibhuRRIbhukShaa RRIbhurvidhato mada aa te harii juujuvaanasya vaajinaa . duShTara.m yasya saama chidRRidhagyaj~no na maanuShaH .
Component Words : RRibhuH . RRIbhukShaaH . RRIbhuH . vidhataH . madaH . aa . te . harii iti . juujuvaanasya . vaajinaa . dustaram . yasya . saama . chit . RRIdhak . yaj~naH . na . maanuShaH . 10.93.8
In Hindi:
ऋषि : तान्वः पार्थ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : आस्तारपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : ऋ॒भुः । ऋ॒भु॒क्षाः । ऋ॒भुः । वि॒ध॒तः । मदः॑ । आ । ते॒ । हरी॒ इति॑ । जू॒जु॒वा॒नस्य॑ । वा॒जिना॑ । दु॒स्तर॑म् । यस्य॑ । साम॑ । चि॒त् । ऋध॑क् । य॒ज्ञः । न । मानु॑षः ॥ १०.९३.८
पदार्थ : (ऋभुक्षाः-ऋभुः) परमात्मा महान् और ज्ञान से भासमान है (विधतः-मदः-ऋभुः) जगत् को रचनेवाले का हर्ष-आनन्द ज्ञान से भरा हुआ है (जूजुवानस्य) बहुत प्रेरित करते हुए तेरे (वाजिना हरी) बलवान् हरणशील कर्मानुसार संसार और मोक्ष में लाने ले जाने धर्मवाले दण्ड प्रसाद हैं (यस्य साम चित्-दुष्टरम्) जिसका अन्तकर्म और स्तवन पापियों से दुस्तरणीय है। (यज्ञः-न मानुषः-ऋधक्) अध्यात्मयज्ञ मानुष-साधारण मनुष्य से साधनेयोग्य द्रव्ययज्ञ नहीं, किन्तु पृथक् मुमुक्षुओं से साध्य है ॥८॥
भावार्थ : परमात्मा महान् ज्ञान से प्रकाशमान है। उस विधाता का आनन्द भी ज्ञान से भरा हुआ है, उसके कर्मानुसार दण्ड और प्रसाद संसार मोक्षफलवाले हैं, उसकी प्राप्ति के लिये अध्यात्मयज्ञ किया जाता है ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : तान्वः पार्थ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : आस्तारपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : ऋ॒भुः । ऋ॒भु॒क्षाः । ऋ॒भुः । वि॒ध॒तः । मदः॑ । आ । ते॒ । हरी॒ इति॑ । जू॒जु॒वा॒नस्य॑ । वा॒जिना॑ । दु॒स्तर॑म् । यस्य॑ । साम॑ । चि॒त् । ऋध॑क् । य॒ज्ञः । न । मानु॑षः ॥ १०.९३.८
भावार्थ :