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Rigveda / 10 / 107 / 9

भो॒जा जि॑ग्युः सुर॒भिं योनि॒मग्रे॑ भो॒जा जि॑ग्युर्व॒ध्वं१॒॑ या सु॒वासा॑: । भो॒जा जि॑ग्युरन्त॒:पेयं॒ सुरा॑या भो॒जा जि॑ग्यु॒र्ये अहू॑ताः प्र॒यन्ति॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 107 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या | देवता : दक्षिणा तद्दातारों वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । सु॒र॒भिम् । योनि॑म् । अग्रे॑ । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । व॒ध्व॑म् । या । सु॒ऽवासाः॑ । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । अ॒न्तः॒ऽपेय॑म् । सुरा॑याः । भो॒जाः । जि॒ग्युः॒ । ये । अहू॑ताः । प्र॒ऽयन्ति॑ ॥ १०.१०७.९

पदार्थ : (भोजाः) दक्षिणादान से अन्यों का पालन करनेवाले (अग्रे) सर्वप्रथम (सुरभिं योनिम्) सुगन्धयुक्त घर को (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (भोजाः) पालन करनेवाले (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (वध्वम्) वधू को (या सुवासाः) जो सुन्दर वस्त्रादियुक्त हो (भोजाः) पालक जन (सुरायाः-अन्तः पेयम्) शोभन [भोग] प्रद स्त्री का अथवा जन का अन्तःपान स्त्री के साथ एकान्तपान को (जिग्युः) प्राप्त करते हैं (भोजाः) पालकजन (अहूताः-ये प्र यन्ति) बिना बुलाए जो प्राप्त होते हैं, उन्हें (जिग्युः) स्वाधीन करते हैं ॥९॥

भावार्थ : अन्यों का दक्षिणा से पालन करनेवाले जन अच्छे सुरम्य सुगन्धयुक्त सदन को प्राप्त होते हैं, सुन्दर वस्त्रादियुक्त वधू को विवाहते हैं। पत्नी के अन्तर्भाव का या एकान्त समागम का आनन्द प्राप्त करते हैं, बिना बुलाये हुओं का हृदय जीतते हैं ॥९॥