Rigveda / 10 / 107 / 10
भो॒जायाश्वं॒ सं मृ॑जन्त्या॒शुं भो॒जाया॑स्ते क॒न्या॒३॒॑ शुम्भ॑माना । भो॒जस्ये॒दं पु॑ष्क॒रिणी॑व॒ वेश्म॒ परि॑ष्कृतं देवमा॒नेव॑ चि॒त्रम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 107 | Mantra No : 10
In English:
Seer : divyo dakShiNaa vaa praajaapatyaa | Devta : dakShiNaa taddaataaro.m vaa | Metre : paadanichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : bhojaayaashva.m sa.m mRRijantyaashu.m bhojaayaaste kanyaa3 shumbhamaanaa . bhojasyeda.m puShkariNiiva veshma pariShkRRita.m devamaaneva chitram .
Component Words : bhojaaya . ashvam . sam . mRRijanti . aashum . bhojaaya . aaste . kanyaa . shumbhamaanaa . bhojasya . idam . puShkariNii.aiva . veshma . pari.akRRitam . devamaanaa.aiva . chitram . 10.107.10
In Hindi:
ऋषि : दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या | देवता : दक्षिणा तद्दातारों वा | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : भो॒जाय॑ । अश्व॑म् । सम् । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒शुम् । भो॒जाय॑ । आ॒स्ते॒ । क॒न्या॑ । शुम्भ॑माना । भो॒जस्य॑ । इ॒दम् । पु॒ष्क॒रिणी॑ऽइव । वेश्म॑ । परि॑ऽकृतम् । दे॒व॒मा॒नाऽइ॑व । चि॒त्रम् ॥ १०.१०७.१०
पदार्थ : (भोजाय) अन्यों का पालन करनेवाले के लिये (आशुम्) शीघ्रगामी (अश्वम्) घोड़े को (सं मृजन्ति) अलङ्कृत करते हैं-सजाते हैं सेवक (भोजाय) पालन करनेवाले के लिये (शुम्भमाना) शोभायमान (कन्या) नवयौवनसम्पन्न कमनीय कुमारी (आस्ते) स्थित है-विवाहार्थ तैयार है (भोजाय) पालन करनेवाले के लिये (इदं-वेश्म) यह घर (परिष्कृतम्) संस्कृत (पुष्करिणी-इव) कमलवाली जलस्थली के समान (चित्रं) दर्शनीय (देवमाना-इव) देवों ऊँचे विद्वान् शिल्पियों से निर्माण किया हुआ जैसा सदन है ॥१०॥
भावार्थ : अन्यों का पालन करने के लिये सवारी करने को सुसज्जित घोड़ा, सुन्दर यौवनसम्पन्न कुमारी विवाह करने को, कमल जलस्थली के समान गृह दर्शनीय होता है रहने को ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या | देवता : दक्षिणा तद्दातारों वा | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : भो॒जाय॑ । अश्व॑म् । सम् । मृ॒ज॒न्ति॒ । आ॒शुम् । भो॒जाय॑ । आ॒स्ते॒ । क॒न्या॑ । शुम्भ॑माना । भो॒जस्य॑ । इ॒दम् । पु॒ष्क॒रिणी॑ऽइव । वेश्म॑ । परि॑ऽकृतम् । दे॒व॒मा॒नाऽइ॑व । चि॒त्रम् ॥ १०.१०७.१०
भावार्थ :