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Rigveda / 10 / 130 / 3

कासी॑त्प्र॒मा प्र॑ति॒मा किं नि॒दान॒माज्यं॒ किमा॑सीत्परि॒धिः क आ॑सीत् । छन्द॒: किमा॑सी॒त्प्रउ॑गं॒ किमु॒क्थं यद्दे॒वा दे॒वमय॑जन्त॒ विश्वे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 130 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : यज्ञः प्राजापत्यः | देवता : भाववृत्तम् | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : का । आ॒सी॒त् । प्र॒ऽमा । प्र॒ति॒ऽमा । किम् । नि॒ऽदान॑म् । आज्य॑म् । किम् । आ॒सी॒त् । प॒रि॒ऽधिः । कः । आ॒सी॒त् । छन्दः॑ । किम् । आ॒सी॒त् । प्रउ॑गम् । किम् । उ॒क्थम् । यत् । दे॒वाः । दे॒वम् । अय॑जन्त । विश्वे॑ ॥ १०.१३०.३

पदार्थ : (का) क्या (प्रमा) प्रमाणरीति (प्रतिमा) प्रतिकृति-रूपरेखा (आसीत्) थी-है (किं निदानम्) क्या हेतु-क्या लक्ष्य था-है (किम्-आज्यम्-आसीत्) क्या घृत दीप्ति का साधन था या है (कः परिधिः-आसीत्) क्या सब ओर से धारण करनेवाला घेरा था या है (छन्दः-किम्-आसीत्) क्या छन्द था या है (प्र उगम्-उक्थं किम्) क्या प्रउग उक्थ था या है (यत्-विश्वेदेवाः) जब सारे विद्वान् (देवम्-अयजन्त) इष्टदेव का यजन करते थे या करते हैं ॥३॥

भावार्थ : उक्त ब्राह्मयज्ञ या शरीरयज्ञ की क्या प्रमारीति या रूपरेखा थी, क्या निदानहेतु या लक्ष्य था, क्या दीप्ति का साधन क्या परिधि या आवर्त्त था, छन्द कौन-प्रउग कौन-उक्थ कौन था, जबकि सारे देव इष्टदेव का यजन करते थे ॥३॥