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Rigveda / 10 / 133 / 3

वि षु विश्वा॒ अरा॑तयो॒ऽर्यो न॑शन्त नो॒ धिय॑: । अस्ता॑सि॒ शत्र॑वे व॒धं यो न॑ इन्द्र॒ जिघां॑सति॒ या ते॑ रा॒तिर्द॒दिर्वसु॒ नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 133 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : सुदाः पैजवनः | देवता : इन्द्र: | छन्द : शक्वरी | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : वि । सु । विश्वा॑ । अरा॑तयः । अ॒र्यः । न॒श॒न्त॒ । नः॒ । धियः॑ । अस्ता॑ । अ॒सि॒ । शत्र॑वे । व॒धम् । यः । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । जिघां॑सति । या । ते॒ । रा॒तिः । द॒दिः । वसु॑ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒केषा॑म् । ज्या॒काः । अधि॑ । धन्व॑ऽसु ॥ १०.१३३.३

पदार्थ : (विश्वाः) सब (अर्यः) आक्रमणकारी (अरातयः) अदानशील अपितु वञ्चनशील शत्रुजातियाँ (सु वि नशन्त) भलीभाँति विनष्ट हों (इन्द्र) हे राजन् ! (नः-धियः) हमारे कर्म तेरे लिए हैं (यः-नः) जो हमें (जिघांसति) मारना-चाहता है, (शत्रवे) उस शत्रु के लिए (वधम्) वधसाधन शस्त्र को (अस्ता) फेंकनेवाला (असि) तू है (ते या रातिः) तेरी जो दानप्रवृत्ति है या दानशक्ति है, वह (नः-वसु ददिः) हमें धनों की देनेवाली हो (नभन्ताम्०) पूर्ववत् ॥३॥

भावार्थ : आक्रमणकारी शत्रु नष्ट हो जावें, ऐसा राजा को यत्न करना चाहिए, प्रजा भी उसका पूरा सहयोग दे, जिससे कि राजा शत्रुओं पर प्रहार करके उन्हें नष्ट कर दे और प्रजा के लिए सुख सम्पत्ति का दान करे ॥३॥