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Rigveda / 2 / 2 / 7

दा नो॑ अग्ने बृह॒तो दाः स॑ह॒स्रिणो॑ दु॒रो न वाजं॒ श्रुत्या॒ अपा॑ वृधि। प्राची॒ द्यावा॑पृथि॒वी ब्रह्म॑णा कृधि॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रमु॒षसो॒ वि दि॑द्युतः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : दाः। नः॒। अ॒ग्ने॒। बृ॒ह॒तः। दाः। स॒ह॒स्रिणः॑। दु॒रः। न। वाज॑म्। श्रुत्यै॑। अप॑। वृ॒धि॒। प्राची॒ इति॑। द्यावा॑पृथि॒वी इति॑। ब्रह्म॑णा। कृ॒धि॒। स्वः॑। न। शु॒क्रम्। उ॒षसः॑। वि। दि॒द्यु॒तः॒॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान विद्वान् ! आप (नः) हम लोगों के लिये (बृहतः) बहुतः भोग करने के पदार्थों को (दाः) दीजिये (वाजम्) ज्ञान (दुरः) द्वारों के (न) समान (श्रुत्यै) श्रवण से (सहस्रिणः) असंख्यात सुखरूपी अङ्गयुक्त पदार्थों को (दाः) दीजिये और (अपा वृधि) उनको प्रकट कीजिये तथा (प्राची) जो पहिले से वर्त्तमान (द्यावापृथिवी) द्यावापृथिवी को (ब्रह्मणा) धन से युक्त (कृधि) कीजिये (उषसः) दिनों को (शुक्रम्) शीघ्रकारी (स्वः) सुख के (न) समान (वि दिद्युतः) विशेष प्रकाशित कीजिये ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो अग्नि के तुल्य असंख्य सुख द्वारों के समान विद्यामार्ग और यथा समय कार्यों से दिवसों को संयुक्त करते हैं, वे सूर्य और पृथिवी के समान अन्नादि के संयोग से सुखी होते हैं ॥७॥