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Rigveda / 2 / 2 / 8

स इ॑धा॒न उ॒षसो॒ राम्या॒ अनु॒ स्व१॒॑र्ण दी॑देदरु॒षेण॑ भा॒नुना॑। होत्रा॑भिर॒ग्निर्मनु॑षः स्वध्व॒रो राजा॑ वि॒शामति॑थि॒श्चारु॑रा॒यवे॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वानों के विषय के अन्तर्गत राजविषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। इ॒धा॒नः। उ॒षसः॑। राम्याः॑। अनु॑। स्वः॑। न। दी॒दे॒त्। अ॒रु॒षेण॑। भा॒नुना॑। होत्रा॑भिः। अ॒ग्निः। मनु॑षः। सु॒ऽअ॒ध्व॒रः। राजा॑। वि॒शाम्। अति॑थिः। चारुः॑। आ॒यवे॑॥

पदार्थ : जैसे (इधानः) प्रकाशमान (सः) वह (अग्निः) अग्नि (अरुषेण) उत्तम रूपयुक्त (भानुना) प्रकाश से (होत्राभिः) ग्रहण की हुई क्रियाओं से (उषसः) प्रतिदिन (राम्याः) रात्रियों में (मनुषः) मनुष्यों को (स्वः) सुख के (न) समान (अनु दीदेत्) अनुकूलता से प्रकाशित कराता वैसे (चारुः) सुन्दर (अतिथिः) सत्कार करने के योग्य जिसके ठहरने की अविद्यमान तिथि वह (स्वध्वरः) न विनाशने योग्य (राजा) प्रकाशमान सभापति (आयवे) राजकार्य्य में चलने अर्थात् प्रवृत्त होने के लिये (विशाम्) प्रजाजनों के बीच वर्त्ते ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे अहोरात्रों का काटनेवाला सूर्य अपने तेज से सबके अनुकूल प्रकाशित होता है, वैसे राजा सत्य और झूठ कार्य्य करानेवालों के विभाग से प्रजाजनों की पालना करे ॥८॥