Rigveda / 2 / 5 / 5
ता अ॑स्य॒ वर्ण॑मा॒युवो॒ नेष्टुः॑ सचन्त धे॒नवः॑। कु॒वित्ति॒सृभ्य॒ आ वरं॒ स्वसा॑रो॒ या इ॒दं य॒युः॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 5 | Mantra No : 5
In English:
Seer : somaahutirbhaargavaH | Devta : agniH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation Under Process
Verse : taa asya varNamaayuvo neShTuH sachanta dhenavaH. kuvittisRRibhya aa vara.m svasaaro yaa ida.m yayuH.
Component Words : taaH. asya. varNam. aayuvaH. neShTuH. sachanta. dhenavaH. kuvit. tisRRi.abhyaH. aa. varam. svasaaraH. yaaH. idam. yayuH.
In Hindi:
ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : अब विदुषी स्त्री के विषय में कहते हैं।
पदपाठ : ताः। अ॒स्य॒। वर्ण॑म्। आ॒युवः॑। नेष्टुः॑। स॒च॒न्त॒। धे॒नवः॑। कु॒वित्। ति॒सृऽभ्यः॑। आ। वर॑म्। स्वसा॑रः। याः। इ॒दम्। य॒युः॥
पदार्थ : (याः) जो (स्वसारः) बहिन कन्या जन (तिसृभ्यः) कर्म, उपासना और ज्ञान विद्याओं से (कुवित्) (वरम्) स्वीकार करने योग्य बन्धु समुदाय को (आ, ययुः) प्राप्त होवें (ताः) वे (अस्य) इस (नेष्टुः) नायक सर्व विद्याओं में अग्रगामी वेद के (वर्णम्) स्वीकार करने योग्य विषय और (इदम्) जल को (आयुवः) प्राप्त हुई (धेनवः) गौओं के समान सबको सुखों से (सचन्त) सम्बन्ध करती हैं ॥५॥
भावार्थ : जो बहिन अपने प्रियबन्धु को और कन्या विद्याविषय को प्राप्त होती हैं, वे गौओं के समान उत्तम सुख को उत्पन्न करती हैं ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : अथ विदुषीविषयमाह।
पदपाठ : ताः। अ॒स्य॒। वर्ण॑म्। आ॒युवः॑। नेष्टुः॑। स॒च॒न्त॒। धे॒नवः॑। कु॒वित्। ति॒सृऽभ्यः॑। आ। वर॑म्। स्वसा॑रः। याः। इ॒दम्। य॒युः॥
पदार्थ : (ताः) (अस्य) वेदस्य (वर्णम्) स्वीकरणीयम् (आयुवः) प्राप्ताः (नेष्टुः) नायकस्य (सचन्त) सङ्गमयन्ति (धेनवः) गावः (कुवित्) बहुः। कुविदिति बहुना० निघं० ३। १ (तिसृभ्यः) कर्मोपासनाज्ञानविद्याभ्यः (आ) समन्तात् (वरम्) वरणीयं बन्धुसमुदायम् (स्वसारः) भगिन्यः (याः) (इदम्) जलम् (ययुः) प्राप्नुयुः ॥५॥
अन्वय : याः स्वसारः कन्यास्तिसृभ्यः कुविद्वरमा ययुस्ता अस्य नेष्टुर्वर्णमिदमायुवो धेनव इव सर्वान् सुखैः सचन्त ॥५॥
भावार्थ : याः स्वसारः कन्याः प्रियं बन्धुं विद्याविषयञ्च प्राप्नुवन्ति ताः धेनुवदुत्तमं सुखं जनयन्ति ॥५॥