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Rigveda / 2 / 5 / 6

यदी॑ मा॒तुरुप॒ स्वसा॑ घृ॒तं भर॒न्त्यस्थि॑त। तासा॑मध्व॒र्युराग॑तौ॒ यवो॑ वृ॒ष्टीव॑ मोदते॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 5 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : सोमाहुतिर्भार्गवः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यदि॑। मा॒तुः। उप॑। स्वसा॑। घृ॒तम्। भर॑न्ती। अस्थि॑त। तासा॑म्। अ॒ध्व॒र्युः। आऽग॑तौ। यवः॑। वृ॒ष्टीऽइ॑व। मो॒द॒ते॒॥

पदार्थ : (यदि) जो (घृतम्) जल को (उप, भरन्ती) समीप होकर भरनेवाली (मातुः) माता की (स्वसा) बहिन वा (तासाम्) उन पूर्वोक्त कन्याओं की अध्यापिका (अस्थित) स्थित होती है तो त्विक् और (अध्वर्युः) यज्ञ का करनेवाला यज्ञ को (आगतौ) प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं वैसे [वा (यवः) (वृष्टीव) वृष्टि से ओषधि वैसे] (मोदते) हर्ष को प्राप्त होती है ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। यदि कन्याजन अध्यापिका विदुषी और माता को प्राप्त होकर विदुषी होती हैं, तो जल से ओषधियों के समान सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होती हैं ॥६॥