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Rigveda / 2 / 23 / 2

दे॒वाश्चि॑त्ते असुर्य॒ प्रचे॑तसो॒ बृह॑स्पते य॒ज्ञियं॑ भा॒गमा॑नशुः। उ॒स्राइ॑व॒ सूर्यो॒ ज्योति॑षा म॒हो विश्वे॑षा॒मिज्ज॑नि॒ता ब्रह्म॑णामसि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : दे॒वाः। चि॒त्। ते॒। अ॒सु॒र्य॒। प्रऽचे॑तसः। बृह॑स्पते। य॒ज्ञिय॑म्। भा॒गम्। आ॒न॒शुः॒। उ॒स्राःऽइ॑व। सूर्यः॑। ज्योति॑षा। म॒हः। विश्वे॑षाम्। इत्। ज॒नि॒ता। ब्रह्म॑णाम्। अ॒सि॒॥

पदार्थ : हे (असुर्य्य) प्रवास रहितों में साधु (बृहस्पते) बड़ी वाणी के पति जिस (प्रचेतसः) प्रकृष्ट ज्ञानवाले (ते) आपके (यज्ञियम्) यज्ञ सम्बन्धि (भागम्) भाग को (सूर्य्यः) सूर्य्य (ज्योतिषा) प्रकाश से (उस्राइव) किरणों के समान (देवाः) विद्वान् जन (चित्) निश्चय से (आनशुः) प्राप्त होते हैं जो आप (महः) महात्मा जन (विश्वेषाम्) समस्त लोक और (ब्रह्मणाम्) धनों के (जनिता) उत्पादन करनेवाले (इत्) ही (असि) हैं सो हम लोगों को सदा सेवन करने योग्य हैं ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो तुम जो प्राण का प्राण सूर्य्य के समान आप ही प्रकाशमान और महात्माओं में महात्मा परमेश्वर है, उसी को सेओ ॥२॥