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Rigveda / 2 / 23 / 3

आ वि॒बाध्या॑ परि॒राप॒स्तमां॑सि च॒ ज्योति॑ष्मन्तं॒ रथ॑मृ॒तस्य॑ तिष्ठसि। बृह॑स्पते भी॒मम॑मित्र॒दम्भ॑नं रक्षो॒हणं॑ गोत्र॒भिदं॑ स्व॒र्विद॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : आ। वि॒ऽबाध्य॑। प॒रि॒ऽरपः॑। तमां॑सि। च॒। ज्योति॑ष्मन्त॑म्। रथ॑म्। ऋ॒तस्य॑। ति॒ष्ठ॒सि॒। बृह॑स्पते। भी॒मम्। अ॒मि॒त्र॒ऽदम्भ॑नम्। र॒क्षः॒ऽहन॑म्। गो॒त्र॒ऽभिद॑म्। स्वः॒ऽविद॑म्॥

पदार्थ : हे (बृहस्पते) बड़ों की रक्षा करनेवाले विद्वान् जैसे सूर्य्य (परिरापः) सब ओर से पाप भरे हुए कर्म (तमांसि च) और रात्रियों को (विबाध्य) निकाल के प्रवृत्त होता वैसे (तस्य) सत्य कारण के बीच वर्त्तमान (भीमम्) भयंकर (अमित्रदम्भनम्) शत्रुहिंसन और (रक्षोहणम्) दुष्टों के मारने (गोत्रभिदम्) और मेघ के छिन्न-भिन्न करनेवाले (स्वर्विदम्) जिससे उदक को प्राप्त होते (ज्योतिष्मन्तम्) जो बहुत प्रकाशमान (रथम्) रमणीय स्वरूप उसको (आ,तिष्ठसि) अच्छे प्रकार स्थित होते हो, सो आप सुख को प्राप्त होते हो ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के समान विद्याप्रकाश से अविद्यान्धकार को निकाल कर कारण को लेकर कार्य्य जगत् को यथावत् जानते हैं, वे विद्वान् होते हैं ॥३॥