Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 23 / 17

विश्वे॑भ्यो॒ हि त्वा॒ भुव॑नेभ्य॒स्परि॒ त्वष्टाज॑न॒त्साम्नः॑साम्नः क॒विः। स ऋ॑ण॒चिदृ॑ण॒या ब्रह्म॑ण॒स्पति॑र्द्रु॒हो ह॒न्ता म॒ह ऋ॒तस्य॑ ध॒र्तरि॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : विश्वे॑भ्यः। हि। त्वा॒। भुव॑नेभ्यः। परि॑। त्वष्टा॑। अज॑नत्। साम्नः॑ऽसाम्नः। क॒विः। सः। ऋ॒ण॒ऽचित्। ऋ॒ण॒ऽयाः। ब्रह्म॑णः। पतिः॑। द्रु॒हः। ह॒न्ता। म॒हः। ऋ॒तस्य॑। ध॒र्तरि॑॥

पदार्थ : हे विद्वान् जो (साम्नःसाम्नः) सामवेद सामवेदमात्र के बीच (कविः) सर्वज्ञ (त्वष्टा) पदार्थों का निर्माण करनेवाला (विश्वेभ्यः) सभी (भुवनेभ्यः) लोकों से जिन (त्वा) आपको (पर्यजनत्) सब प्रकार प्रकट करता है (सः) वह (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्माण्ड की पालना करनेवाला है उस (महः) महान् (तस्य) सत्य कारण के (धर्त्तरि) धारण करनेवाले जगदीश्वर में स्थित (णचित्) ण को इकट्ठा करने और (णयाः) णको प्राप्त होनेवाले आप (द्रुहः) द्रोह करनेवाले के (हन्ता) नाशक हूजिये ॥१७॥

भावार्थ : हे जीव जो सर्वज्ञ सृष्टिकर्त्ता सकल भुवनों का एक स्वामी और सबका धारणकरनेवाला जगदीश्वर है, उसकी आज्ञा में स्थित द्रोहादिकों को दूर से दूर करे ॥१७॥