Rigveda / 2 / 23 / 18
तव॑ श्रि॒ये व्य॑जिहीत॒ पर्व॑तो॒ गवां॑ गो॒त्रमु॒दसृ॑जो॒ यद॑ङ्गिरः। इन्द्रे॑ण यु॒जा तम॑सा॒ परी॑वृतं॒ बृह॑स्पते॒ निर॒पामौ॑ब्जो अर्ण॒वम्॥
Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 23 | Mantra No : 18
In English:
Seer : gRRitsamadaH shaunakaH | Devta : bRRihaspatiH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tava shriye vyajihiita parvato gavaa.m gotramudasRRijo yada~NgiraH. indreNa yujaa tamasaa pariivRRita.m bRRihaspate nirapaamaubjo arNavam.
Component Words : tava. shriye. vi. ajihiita. parvataH. gavaam. gotram. ut. asRRijaH. yat. a~NgiraH. indreNa. yujaa. tamasaa. pari.avRRitam. bRRihaspate. niH. apaam. aubjaH. arNavam.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।
पदपाठ : तव॑। श्रि॒ये। वि। अ॒जि॒ही॒त॒। पर्व॑तः। गवा॑म्। गो॒त्रम्। उ॒त्। असृ॑जः। यत्। अ॒ङ्गि॒रः॒। इन्द्रे॑ण। यु॒जा। तम॑सा। परि॑ऽवृतम्। बृह॑स्पते। निः। अ॒पाम्। औ॒ब्जः॒। अ॒र्ण॒वम्॥
पदार्थ : हे (अङ्गिरः) प्राणप्रिय (बृहस्पते) बड़ों की पालना करनेवाले (तव) आपकी (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (पर्वतः) मेघ (गवाम्) सूर्यमण्डल की किरणों के (यत्) जो (गोत्रम्) कुलको (वि,अजिहीत) विशेषता से प्राप्त होता वा (उदसृजः) किसी पदार्थ का त्याग करता सो आप (इन्द्रेण) सूर्य (युजा) युक्त (तमसा) अन्धकार से (परीवृतम्) सब प्रकार ढपा हुआ अग्नि जैसे हो वैसे (अपाम्) जलों के बीच (औब्जः) कोमलपन में प्रसिद्ध हूजिये तथा (अर्णवम्) समुद्र को (निः) निरन्तर प्रकट हूजिये ॥१८॥
भावार्थ : जिस ईश्वर ने सूर्यादिक जगत् का निर्माण कर परस्पर सम्बन्ध किया, उसको प्राणप्रिय जानो ॥१८॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह।
पदपाठ : तव॑। श्रि॒ये। वि। अ॒जि॒ही॒त॒। पर्व॑तः। गवा॑म्। गो॒त्रम्। उ॒त्। असृ॑जः। यत्। अ॒ङ्गि॒रः॒। इन्द्रे॑ण। यु॒जा। तम॑सा। परि॑ऽवृतम्। बृह॑स्पते। निः। अ॒पाम्। औ॒ब्जः॒। अ॒र्ण॒वम्॥
पदार्थ : (तव) (श्रिये) (वि) (अजिहीत) प्राप्नोति (पर्वतः) मेघः (गवाम्) किरणानाम् (गोत्रम्) कुलम् (उदसृजः) उत्सृजति त्यजति (यत्) (अङ्गिरः) प्राणप्रिय (इन्द्रेण) सूर्येण (युजा) युक्तेन (तमसा) अन्धकारेण (परीवृतम्) सर्वत आवृतम् (बृहस्पते) (निः) (अपाम्) जलानाम् (औब्जः) आर्जवे भव (अर्णवम्) समुद्रम् ॥१८॥
अन्वय : हे अङ्गिरो बृहस्पते तव श्रिये पर्वतो गवां यद्गोत्रं व्यजिहीतोदसृजः स त्वमिन्द्रेण युजा तमस्य परीवृतमपामौब्जोर्णवं निर्जनय ॥१८॥
भावार्थ : येन जगदीश्वरेण सूर्य्यादिकं जगन्निर्माय परस्परं सम्बन्धं कृतं तन्प्राणप्रियं विजानीत ॥१८॥