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Rigveda / 2 / 27 / 6

सु॒गो हि वो॑ अर्यमन्मित्र॒ पन्था॑ अनृक्ष॒रो व॑रुण सा॒धुरस्ति॑। तेना॑दित्या॒ अधि॑ वोचता नो॒ यच्छ॑ता नो दुष्परि॒हन्तु॒ शर्म॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 27 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : आदित्याः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर विद्वानों के संग में प्रीति रखनेवाले मनुष्य लोग क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सु॒ऽगः। हि। वः॒। अ॒र्य॒म॒न्। मि॒त्र॒। पन्थाः॑। अ॒नृ॒क्ष॒रः। व॒रु॒ण॒। सा॒धुः। अस्ति॑। तेन॑। आ॒दि॒त्याः॒। अधि॑। वो॒च॒त॒। नः॒। यच्छ॑त। नः॒। दुः॒ऽप॒रि॒हन्तु॑। शर्म॑॥

पदार्थ : हे (आदित्या: विद्वान् लोगो हे (अर्यमन्) श्रेष्ठ सत्कार युक्त हे (मित्र) मित्र हे (वरुण) प्रतिष्ठित सज्जन पुरुष जो (वः) तुम लोगों का (अनृक्षरः) कण्टकादि रहित (सुगः) जिसमें निर्विघ्न चल सकें (साधुः) जिसमें धर्म को सिद्ध करते ऐसा (पन्थाः) मार्ग (अस्ति) है (तेन, हि) उसी मार्ग से चलने के लिये (नः) हमको (अधि,वोचत) अधिक कर उपदेश करो और जो यह (दुष्परिहन्तु) बड़ी कठिनता से टूटे-फूटे ऐसे विद्याभ्यासादि के लिये बना हुआ (शर्म) घर है वह (नः) हमारे लिये (यच्छत) देओ ॥६॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि धर्मात्मा विद्वानों के स्वभाव को ग्रहण कर वेदोक्त सत्य मार्ग में चलें, जिससे सत्यशास्त्र के पढ़ने-पढ़ाने की वृद्धि होवे, वही कर्म सदा सेवने योग्य है ॥६॥