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Rigveda / 2 / 27 / 7

पिप॑र्तु नो॒ अदि॑ती॒ राज॑पु॒त्राति॒ द्वेषां॑स्यर्य॒मा सु॒गेभिः॑। बृ॒हन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्य॒ शर्मोप॑ स्याम पुरु॒वीरा॒ अरि॑ष्टाः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 27 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : आदित्याः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब न्यायाधीश का विषय अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : पिप॑र्तु। नः॒। अदि॑तिः। राज॑ऽपु॒त्रा। अति॑। द्वेषां॑सि। अ॒र्य॒मा। सु॒ऽगेभिः॑। बृ॒हत्। मि॒त्रस्य॑। वरु॑णस्य। शर्म॑। उप॑। स्या॒म॒। पु॒रु॒ऽवीराः॑। अरि॑ष्टाः॥

पदार्थ : जो (राजपुत्रा) जिसका पुत्र राजा हो ऐसी (अदितिः) माता के तुल्य सुख देनेवाली राज्ञी और जो (अर्यमा) विद्वानों से प्रीति रखनेवाला राजा (सुगेभिः) सुगम मार्गों से (द्वेषांसि,अति) वैर द्वेषों को अच्छे प्रकार छुड़ाके (नः) हमारा (पिपर्त्तु) पालन करे (मित्रस्य) मित्र तथा (वरुणस्य) प्रशंसायुक्त पुरुष के (बृहत्) बड़े ऐश्वर्यवाले (शर्म) घर की रक्षा करे उस राजा रानी के संग सम्बन्ध से हम लोग (अरिष्टाः) किसी से न मारने योग्य (पुरुवीराः) शरीर आत्मा के बल से युक्त बहुत पुत्र भृत्यादि जिनके हों ऐसे (उप,स्याम) आपके निकट होवें ॥७॥

भावार्थ : जैसे न्यायाधीश राजा न्यायघर में बैठ के पुरुषों को दण्ड देवे, वैसे न्यायाधीशा रानी स्त्रियों का न्याय करे। उस न्यायघर में रागद्वेष और प्रीति अप्रीति छोड़के केवल न्याय ही किया करे, अन्य कुछ न करे ॥७॥