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Rigveda / 2 / 27 / 13

शुचि॑र॒पः सू॒यव॑सा॒ अद॑ब्ध॒ उप॑ क्षेति वृ॒द्धव॑याः सु॒वीरः॑। नकि॒ष्टं घ्न॒न्त्यन्ति॑तो॒ न दू॒राद्य आ॑दि॒त्यानां॒ भव॑ति॒ प्रणी॑तौ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 27 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : आदित्याः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर कैसा राजा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : शुचिः॑। अ॒पः। सु॒ऽयव॑साः। अद॑ब्धः। उप॑। क्षे॒ति॒। वृ॒द्धऽव॑याः। सु॒ऽवीरः॑। नकिः॑। तम्। घ्न॒न्ति॒। अन्ति॑तः। न। दू॒रात्। यः। आ॒दि॒त्याना॑म्। भव॑ति। प्रऽनी॑तौ॥

पदार्थ : (यः) जो शुचिः पवित्र (अदब्धः) हिंसा अर्थात् किसी से दुःख को न प्राप्त हुआ राजा (सुयवसाः) जिनसे अच्छे जौ आदि अन्न उत्पन्न हों उन (पय:) जलों के (उप,क्षेति) निकट वसता है जो (वृद्धवयाः) बड़े जीवनवाला (सुवीरः) सुन्दर वीर पुरुषों से युक्त (आदित्यानाम्) पूर्ण ब्रह्मचर्य और विद्यावाले पुरुषों की (प्रणीतौ) उत्तम नीति में वर्त्तमान (भवति) होता है (तम्) उसको (नकिः) नहीं कोई (अन्तितः) समीप से (न) न (दूरात्) दूर से कोई (घ्रन्ति) मार सकते हैं ॥१३॥

भावार्थ : जो पवित्र आचरणवाला हिंसादि दोषों से रहित पूर्ण सामग्रीवाला दीर्घजीवी विद्वानों की रक्षा में सदा रहता, उसका समीपस्थ और दूरस्थ शत्रु लोग पराजय कदापि नहीं कर सकते ॥१३॥