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Rigveda / 2 / 27 / 14

अदि॑ते॒ मित्र॒ वरु॑णो॒त मृ॑ळ॒ यद्वो॑ व॒यं च॑कृ॒मा कच्चि॒दागः॑। उ॒र्व॑श्या॒मभ॑यं॒ ज्योति॑रिन्द्र॒ मा नो॑ दी॒र्घा अ॒भि न॑श॒न्तमि॑स्राः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 27 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : कूर्मो गार्त्समदो गृत्समदो वा | देवता : आदित्याः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अदि॑ते। मित्र॑। वरु॑ण। उ॒त। मृ॒ळ॒। यत्। वः॒। व॒यम्। च॒कृ॒म। कत्। चि॒त्। आगः॑। उ॒रु। अ॒श्या॒म्। अभ॑यम्। ज्योतिः॑। इ॒न्द्र॒। मा। नः॒। दी॒र्घाः। अ॒भि। न॒श॒न्। तमि॑स्राः॥

पदार्थ : हे (अदिते) अखण्डित स्वरूप और विज्ञानवाली न्यायकर्त्री राज्ञी तथा हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (मित्र) सबके सखा (उत) और (वरुण) सबसे उत्तम राजन् आप हमको (मृळ) सुखी करो (यत्) जो (वः) तुम्हारा (कश्चित्) कुछ (उरु) बड़ा (आगः) अपराध (वयम्) हम (चकृम) करें उसको क्षमा करो जिससे (अभयम्) भयरहित (ज्योतिः) प्रकाशयुक्त दिन को (अश्याम्) प्राप्त होऊँ और (नः) हमारी (दीर्घाः) बड़ी (तमिस्राः) रात्री (मा) (न) (नशन्) कटें अर्थात् रात्रि को सुखपूर्वक निर्भय सोवें ॥१४॥

भावार्थ : जिस देश वा नगर में विदुषी स्त्री स्त्रियों का न्याय करनेवाली और पुरुषों का न्याय करनेवाला विद्वान् पुरुष हो, उस देश वा नगर में दिन रात्री निर्भय होते और विशेषकर चोर आदि के भय से रहित सुखपूर्वक रात्री व्यतीत होती है ॥१४॥