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Rigveda / 2 / 33 / 2

त्वाद॑त्तेभी रुद्र॒ शंत॑मेभिः श॒तं हिमा॑ अशीय भेष॒जेभिः॑। व्य१॒॑स्मद्द्वेषो॑ वित॒रं व्यंहो॒ व्यमी॑वाश्चातयस्वा॒ विषू॑चीः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 33 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : रुद्रः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वैद्य विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : त्वाऽद॑त्तेभिः। रु॒द्र॒। शम्ऽत॑मेभिः। श॒तम्। हिमाः॑। अ॒शी॒य॒। भे॒ष॒जेभिः॑। वि। अ॒स्मत्। द्वेषः॑। वि॒ऽत॒रम्। वि। अंहः॑। वि। अमी॑वाः। चा॒त॒य॒स्व॒। विषू॑चीः॥

पदार्थ : हे (रुद्र) सर्वरोग दोषों के निवारनेवाले वैद्यराज ! आप हम लोगों को (वि,चातयस्व) विशेष कर जाँचें (त्वादत्तेभिः) आपसे दी हुई (शंतमेभिः) अतीव सुख करनेवाली (भेषजेभिः) औषधों से (विषूचीः) समग्र शरीर में व्याप्त (अमीवाः) रोगों को दूर करो, और आप (अस्मत्) हमसे हमारे (द्वेषः) वैरियों को वा ईर्ष्या आदि दोषों को और (वितरम्) विशेषता से उल्लंघन करने योग्य (अंहः) पाप भरे हुए कर्म वा कुपथ्यादि कर्म को दूर करें जिससे मैं (शतम्) सौ (हिमाः) संवत्सर आनन्द को (वि,अशीय) विशेष कर प्राप्त होऊँ ॥२॥

भावार्थ : हे वैद्य लोगो ! तुम अत्युत्तम ओषधियों से सब के बड़े-बड़े रोगों को निवारण करके रागद्वेषों को और उन्माद आदि दोषों को अलग कर शतवर्ष आयु जिनकी ऐसे मनुष्यों को सिद्ध करो ॥२॥