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Rigveda / 2 / 33 / 3

श्रेष्ठो॑ जा॒तस्य॑ रुद्र श्रि॒यासि॑ त॒वस्त॑मस्त॒वसां॑ वज्रबाहो। पर्षि॑ णः पा॒रमंह॑सः स्व॒स्ति विश्वा॑ अ॒भी॑ती॒ रप॑सो युयोधि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 33 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : रुद्रः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : श्रेष्ठः॑। जा॒तस्य॑। रु॒द्र॒। श्रि॒या। अ॒सि॒। त॒वःऽत॑मः। त॒वसा॑म्। व॒ज्र॒बा॒हो॒ इति॑ वज्रऽबाहो। पर्षि॑। नः॒। पा॒रम्। अंह॑सः। स्व॒स्ति। विश्वाः॑। अ॒भिऽइ॑तीः। रप॑सः। यु॒यो॒धि॒॥

पदार्थ : हे (वज्रबाहो) वज्र के तुल्य औषध बाहु में रखने और (रुद्र) रोगों के लोप करनेवाले ! जिससे आप (तवसाम्) बलिष्ठों में (तवस्तमः) अतीव बलवान् (जातस्य) प्रसिद्ध जगत् के बीच (श्रेष्ठः) अत्यन्त प्रशंसायुक्त (श्रिया) शोभा वा लक्ष्मी के साथ वर्त्तमान (अति) हो वा (नः) हमलोगों को (अंहसः) कुपथ्य से उत्पन्न हुए (रपसः) कर्म से (पारम्) पार (पर्षि) पहुँचाते हो वा (विश्वाः) समस्त पीड़ाओं को (युयोधि) अलग करते हो वा (स्वस्ति) सुख उत्पन्न करते हो, इससे हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हो ॥३॥

भावार्थ : जो आप रोगरहित शोभते हुए अतीव बलवान् हैं, औरों को रोगरहित करके निरन्तर सुखी करते हैं, वे सबको सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं ॥३॥