Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 34 / 9

यो नो॑ मरुतो वृ॒कता॑ति॒ मर्त्यो॑ रि॒पुर्द॒धे व॑सवो॒ रक्ष॑ता रि॒षः। व॒र्तय॑त॒ तपु॑षा च॒क्रिया॒भि तमव॑ रुद्रा अ॒शसो॑ हन्तना॒ वधः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 34 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर राजपुरुषों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : यः। नः॒। म॒रु॒तः॒। वृ॒कऽता॑ति। मर्त्यः॑। रि॒पुः। द॒धे। व॒स॒वः॒। रक्ष॑त। रि॒षः। व॒र्तय॑त। तपु॑षा। च॒क्रिया॑। अ॒भि। तम्। अव॑। रु॒द्राः॒। अ॒शसः॑। ह॒न्त॒न॒। वध॒रिति॑॥

पदार्थ : हे (वसवः) वसु संज्ञावाले (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो ! (यः) जो (वृकताति) वज्र ही (मर्त्यः) मरणधर्मा (रिपुः) चोर (तपुषा) सब ओर से ताप देनेवाले क्रोध आदि से (नः) हमलोगों को (दधे) धारण करता है उससे (रिषः) हिंसकों को अलग (रक्षत) रखो, हे (रुद्राः) दुष्टों को रुलानेवाले मध्यम विद्वानो ! तुम (चक्रिया) चक्र से (अशसः) अहिंसक जो दूसरों का विनाश नहीं करता उसको (अव,हन्तन) न मारो, जो हम लोगों की रक्षा करता है, उसकी सब ओर से रक्षा करो, जिसने और का (वधः) बध किया है, उसको कारागृह अर्थात् जेलखाना में (अभि,वर्त्तयत) सब ओर से वर्त्ताओ ॥९॥

भावार्थ : राजपुरुषों को हिंसकों से प्रजाजनों को अलग रख शत्रुओं का निवारण कर वा बाँध के धर्म से राज्य का शासन करना चाहिये ॥९॥