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Rigveda / 2 / 34 / 10

चि॒त्रं तद्वो॑ मरुतो॒ याम॑ चेकिते॒ पृश्न्या॒ यदूध॒रप्या॒पयो॑ दु॒हुः। यद्वा॑ नि॒दे नव॑मानस्य रुद्रियास्त्रि॒तं जरा॑य जुर॒ताम॑दाभ्याः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 34 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : मरुतः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर विद्वान् विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : चि॒त्रम्। तत्। वः॒। म॒रु॒तः॒। याम॑। चे॒कि॒ते॒। पृश्न्याः॑। यत्। ऊधः॑। अपि॑। आ॒पयः॑। दु॒हुः। यत्। वा॒। नि॒दे। नव॑मानस्य। रु॒द्रि॒याः॒। त्रि॒तम्। जरा॑य। जु॒र॒ताम्। अ॒दा॒भ्याः॒॥

पदार्थ : हे (अदाभ्याः) न नष्ट करने योग्य (रुद्रियाः) मध्यम विद्वानों के सम्बन्धी (मरुतः) मनुष्यो ! (यत्) जिस (वः) तुम्हारा (चित्रम्) अद्भुत (याम) योग्य कर्म वा (यत्) जिस (पृश्न्याः) अन्तरिक्ष में सिद्ध हुए (ऊधः) जल वा दूध के अधिकरण को (आपयः) मित्रभाव को प्राप्त हुए (दुहुः) परिपूर्ण करते हैं (वा) अथवा (यः) जो (नवमानस्य) स्तुति करने की (निदे) निन्दा करनेवाले के लिये (त्रितम्) हिंसा करनेवाले को (जुरताम्) जीर्णों की (जराय) स्तुति करनेवाले के लिये (अपि) भी (चेकिते) जानता है (तत्) उसको तुम लेओ ॥१०॥

भावार्थ : हे विद्वानो ! तुम निन्दा करने योग्य की निन्दा तथा स्तुति करने योग्य की प्रशंसा कर अद्भुत कर्मों को करो, जिससे पूरी आयु भोग वृद्धावस्था पाकर मरण हो, उस अनुष्ठान को करो ॥१०॥