Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 35 / 5

अ॒स्मै ति॒स्रो अ॑व्य॒थ्याय॒ नारी॑र्दे॒वाय॑ दे॒वीर्दि॑धिष॒न्त्यन्न॑म्। कृता॑इ॒वोप॒ हि प्र॑स॒र्स्रे अ॒प्सु स पी॒यूषं॑ धयति पूर्व॒सूना॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 35 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अपान्नपात् | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒स्मै। ति॒स्रः। अ॒व्य॒थ्याय॑। नारीः॑। दे॒वाय॑। दे॒वीः। दि॒धि॒ष॒न्ति॒। अन्न॑म्। कृता॑ऽइव। उप॑। हि। प्र॒ऽस॒र्स्रे। अ॒प्ऽसु। सः। पी॒यूष॑म्। ध॒य॒ति॒। पू॒र्व॒ऽसूना॑म्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (कृता इव) निष्पन्न हुई सी (तिस्रः) तीन (देवीः) निरन्तर प्रकाशमान (नारीः) स्त्री हमलोगों के (अव्यथ्याय) व्यथन अर्थात् नष्ट करने को नहीं योग्य (देवाय) काम के लिये (अन्नम्) अन्न (दिधिषन्ति) धारण करती हैं तथा जो (अप्सु) अन्तरिक्ष प्रदेशों में जल (उप,प्रसर्स्रे) अच्छे प्रकार पास में बहते हैं उन (पूर्वसूनाम्) पहले सन्तानों को उत्पन्न करनेवालियों का (सः) वह विद्वान् सन्तान (हि) ही (पीयूषम्) अमृत के समान दुग्ध को (धयति) पीता है ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। तीन प्रकार की निश्चय स्त्रियाँ होती हैं, जो समान पतियोंवाली होकर विधवा हों, तो सन्तानों की उत्पत्ति के लिये अपने समान पुरुषों से वीर्य लेकर धर्म से सन्तानों को उत्पन्न करें। जो सन्तानों की विशेष इच्छा न हो तो ब्रह्मचर्य में स्थिर हों ॥५॥