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Rigveda / 2 / 35 / 6

अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्व॑र्द्रु॒हो रि॒षः सं॒पृचः॑ पाहि सू॒रीन्। आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अ॑प्रमृ॒ष्यं नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 35 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अपान्नपात् | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अश्व॑स्य। अत्र॑। जनि॑म। अ॒स्य। च॒। स्वः॑। द्रु॒हः। रि॒षः। स॒म्ऽपृचः॑। पा॒हि॒। सू॒रीन्। आ॒मासु॑। पू॒र्षु। प॒रः। अ॒प्र॒ऽमृ॒ष्यम्। न। अरा॑तयः। वि। न॒श॒न्। न। अनृ॑तानि॥

पदार्थ : जिससे (अत्र) इस व्यवहार में (अस्य) इस (अश्वस्य) महान् वीर्य्य देनेवाले का (जनिम) जन्म होता है उससे यहाँ (स्वः) सुख बढ़ता है जो (परः) परमोत्तम आप (आमासु) घर में हुई (पूर्षु) पूरियों में (द्रुहः) ईर्ष्यक (रिषः) हिंसा और (संपृचः) संयोग करनेवालों के (सूरीन्) सम्बन्धी विद्वानों को (अप्रमृष्यम्,च) और सहने को न योग्य व्यवहारों को (पाहि) रक्षा करो और आपको (अरातयः) शत्रुजन (न) नहीं पीड़ा देने तथा (अनृतानि) मिथ्या कर्मों को (न) नहीं (विनशन्) विशेषता से प्राप्त होते हैं ॥६॥

भावार्थ : जिस कुल के बीच बड़े महात्मा जन उत्पन्न होते हैं, वहाँ सुख बढ़ता है और जहाँ शरीर और आत्मा के बलयुक्त मनुष्य हों, वहाँ शत्रुजन पीड़ा नहीं कर सकते हैं और बलवान् पुरुष झूँठ अधर्मयुक्त कामों का उत्साह नहीं करते हैं ॥६॥