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Rigveda / 3 / 31 / 16

अ॒पश्चि॑दे॒ष वि॒भ्वो॒३॒॑ दमू॑नाः॒ प्र स॒ध्रीची॑रसृजद्वि॒श्वश्च॑न्द्राः। मध्वः॑ पुना॒नाः क॒विभिः॑ प॒वित्रै॒र्द्युभि॑र्हिन्वन्त्य॒क्तुभि॒र्धनु॑त्रीः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 31 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अ॒पः। चि॒त्। ए॒षः। वि॒ऽभ्वः॑। दमू॑नाः। प्र। स॒ध्रीचीः॑। अ॒सृ॒ज॒त्। वि॒श्वऽच॑न्द्राः। मध्वः॑। पु॒ना॒नाः। क॒विऽभिः॑। प॒वित्रैः॑। द्युऽभिः॑। हि॒न्व॒न्ति॒। अ॒क्तुऽभिः॑। धनु॑त्रीः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो लोग (कविभिः) विद्वान् जनों के सहित (पवित्रैः) उत्तम व्यवहारों तथा (द्युभिः) दिनों और (अक्तुभिः) रात्रियों से (मध्वः) कोमल स्वभाववाले मनुष्यों को (पुनानाः) पवित्र करते हुए जन (धनुत्रीः) धन और धान्य आदिकों से युक्त (हिन्वन्ति) बढ़ाते वा बढ़ते हैं जो (चित्) भी (एषः) यह (विभ्वः) व्यापक (दमूनाः) जितेन्दिय मनयुक्त (सध्रीचीः) एक साथ मिले हुए (विश्वश्चन्द्राः) संपूर्ण सुवर्ण आदिकों से युक्त (अपः) जलों के सदृश व्याप्त विद्याओं को (प्र) (असृजत्) उत्पन्न करता है, उन और उसका सर्व जन सङ्गम करें ॥१६॥

भावार्थ : जो विद्वान् लोग बहुत ऐश्वर्य्यों के जनक पदार्थों को कार्य सिद्धि के लिये उपयोग में लाते तथा विद्वान् जनों के साथ शुद्ध आचरणों को करके सुख और ऐश्वर्य्य दिन रात्रि बढ़ाते, वे भाग्यशाली हैं ॥१६॥