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Rigveda / 3 / 31 / 17

अनु॑ कृ॒ष्णे वसु॑धिती जिहाते उ॒भे सूर्य॑स्य मं॒हना॒ यज॑त्रे। परि॒ यत्ते॑ महि॒मानं॑ वृ॒जध्यै॒ सखा॑य इन्द्र॒ काम्या॑ ऋजि॒प्याः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 31 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : गाथिनो विश्वामित्रः, ऐषीरथीः कुशिको वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : अनु॑। कृ॒ष्णे इति॑। वसु॑धिती॒ इति॒ वसु॑ऽधिती। जि॒हा॒ते॒ इति॑। उ॒भे इति॑। सूर्य॑स्य। मं॒हना॑। यज॑त्रे। परि॑। यत्। ते॒। म॒हि॒मान॑म्। वृ॒जध्यै॑। सखा॑यः। इ॒न्द्र॒। काम्याः॑। ऋ॒जि॒प्याः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् ! (यत्) जो (ते) आपके (काम्याः) कामना करने योग्य (ऋजिप्याः) सरल व्यवहारों के वर्द्धक (सखायः) मित्र हुए (महिमानम्) महिमा को (अनु) (कृष्णे) खींची गयी (उभे) दोनों (यजत्रे) परस्पर मिली हुई (वसुधिती) अन्तरिक्ष और पृथिवी (सूर्यस्य) सूर्य के (मंहना) महत्व से (वृजध्यै) रोकने को (परि) (जिहाते) प्राप्त होते से हैं उनको बढ़ाते हैं, वे आपसे सत्कार पाने योग्य हैं ॥१७॥

भावार्थ : जैसे सूर्य अपने प्रताप से भूमि और प्रकाश का आकर्षण करके धारण करता है और जैसे भूमि तथा प्रकाश सम्पूर्ण पदार्थों को धारण करते हैं, वैसे उत्तम पुरुष को चाहिये कि महिमा को धारण और दुर्व्यसनों को त्याग करके मित्रों का सत्कार करें ॥१७॥