Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 48 / 2

यज्जाय॑था॒स्तदह॑रस्य॒ कामें॒ऽशोः पी॒यूष॑मपिबो गिरि॒ष्ठाम्। तं ते॑ मा॒ता परि॒ योषा॒ जनि॑त्री म॒हः पि॒तुर्दम॒ आसि॑ञ्च॒दग्रे॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 48 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब सन्तान की उत्पत्ति के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : यत्। जाय॑थाः। तत्। अहः॑। अ॒स्य॒। कामे॑। अं॒शोः। पी॒यूष॑म्। अ॒पि॒बः॒। गि॒रि॒ऽस्थाम्। तम्। ते॒। मा॒ता। परि॑। योषा॑। जनि॑त्री। म॒हः। पि॒तुः। दमे॑। आ। अ॒सि॒ञ्च॒त्। अग्रे॑॥

पदार्थ : हे राजन् ! आप (यत्) जिस (अहः) दिन (जायथाः) उत्पन्न हुए (तत्) उस दिन की (कामे) कामना में (अस्य) इस (अंशोः) प्राप्त हुए भाग के (गिरिष्ठाम्) मेघ में विद्यमान (पीयूषम्) अमृतरूप रस को (ते) आपके पिता (अपिबः) पान करें (तम्) उसको आपके (पितुः) पालक और उत्पादक पिता की (योषा) स्त्री आपकी (जनित्री) उत्पन्न करनेवाली (माता) माता (अग्रे) पहिले (दमे) घर में (महः) बड़े को (परि, आ, असिञ्चत्) चारों ओर से सींचता है ॥२॥

भावार्थ : जब स्त्री और पुरुष गर्भ को धारण करें तब दुष्ट अन्न पान आदि का सेवन त्याग श्रेष्ठ अन्न पान गर्भधारण और सन्तान उत्पन्न करके फिर उसका भी इसी प्रकार पालन और वृद्धि करे, जो कि राजा होने को योग्य हो ॥२॥