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Rigveda / 3 / 48 / 3

उ॒प॒स्थाय॑ मा॒तर॒मन्न॑मैट्ट ति॒ग्मम॑पश्यद॒भि सोम॒मूधः॑। प्र॒या॒वय॑न्नचर॒द्गृत्सो॑ अ॒न्यान्म॒हानि॑ चक्रे पुरु॒धप्र॑तीकः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 48 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : उ॒प॒ऽस्थाय॑। मा॒तर॑म्। अन्न॑म्। ऐ॒ट्ट॒। ति॒ग्मम्। अ॒प॒श्य॒त्। अ॒भि। सोम॑म्। ऊधः॑। प्र॒ऽय॒वय॑न्। अ॒च॒र॒त्। गृत्सः॑। अ॒न्यान्। म॒हानि॑। च॒क्रे॒। पु॒रु॒धऽप्र॑तीकः॥

पदार्थ : जो (गृत्सः) बुद्धिमान् (पुरुधप्रतीकः) बहुतों को धारण करनेवालों के प्रति प्राप्त होनेवाला सूर्य्य (ऊधः) प्रातःकाल की रात्रि को जैसे वैसे (मातरम्) पुत्र की माता को (उपस्थाय) समीप प्राप्त होकर (अन्नम्) खाने योग्य पदार्थ की (ऐट्ट) प्रशंसा करे और (प्रयावयन्) संयोग वा विभाग करता हुआ (सोमम्) ऐश्वर्य्य को (अभि) चारों ओर से (अपश्यत्) देखे और (अन्यान्) औरों को (अचरत्) आचरण करे (महानि) बड़े सन्तानों को (चक्रे) उत्पन्न करे, वही राजा होने योग्य है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य प्रातःकाल की रात्रि को प्राप्त होकर दिन को उत्पन्न करता है, वैसे ही सन्तान की माता को सन्तान का पिता प्राप्त होकर गर्भस्थिति करे और वैसे ही संस्कारों को माता और पिता करें कि जैसे सन्तान उत्तम गुण, कर्म, लक्षण,स्वभावों से युक्त राजकर्मों को करने योग्य होवें ॥३॥