Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 53 / 22

प॒र॒शुं चि॒द्वि त॑पति शिम्ब॒लं चि॒द्वि वृ॑श्चति। उ॒खा चि॑दिन्द्र॒ येष॑न्ती॒ प्रय॑स्ता॒ फेन॑मस्यति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 53 | Mantra No : 22

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब राजा के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : प॒र॒शुम्। चि॒त्। वि। त॒प॒ति॒। शि॒म्ब॒लम्। चि॒त्। वि। वृ॒श्च॒ति॒। उ॒खा। चि॒त्। इ॒न्द्र॒ येष॑न्ती। प्रऽय॑स्ता। फेन॑म्। अ॒स्य॒ति॒॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त ! जो आपकी सेना लोहार (परशुम्) परशारूप शस्त्र को (चित्) जैसे वैसे शत्रुओं को (वि, तपति) विशेष करके सन्ताप देती है (शिम्बलम्) शेमर वृक्ष के पुष्प वा पत्र को (चित्) जैसे (वि, वृश्चति) विशेष करके काटता है (प्रयस्ता) प्रेरित हुई (येषन्ती) वहता तथा प्राप्त हुआ (उखा) पाक करनेका पात्र (चित्) जैसे (फेनम्) फेने को वैसे शत्रुओं को (अस्यति) फेंकती है उसका आपसे सदा सत्कार करने योग्य है ॥२२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा लोग श्रेष्ठ वीरों की सेना की रक्षा करते हैं, वे ही विजय को प्राप्त होकर शोभित होते हैं ॥२२॥