Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 3 / 53 / 23

न साय॑कस्य चिकिते जनासो लो॒धं न॑यन्ति॒ पशु॒ मन्य॑मानाः। नावा॑जिनं वा॒जिना॑ हासयन्ति॒ न ग॑र्द॒भं पु॒रो अश्वा॑न्नयन्ति॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 53 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : न। साय॑कस्य। चि॒कि॒ते॒। ज॒ना॒सः॒। लो॒धम्। न॒य॒न्ति॒। पशु॑। मन्य॑मानाः। न। अवा॑जिनम्। वा॒जिना॑। हा॒स॒य॒न्ति॒। न। ग॒र्द॒भम्। पु॒रः। अश्वा॑त्। न॒य॒न्ति॒॥

पदार्थ : हे राजन् ! जो वे (जनासः) वीरपुरुष (लोधम्) प्राप्त होनेवाले को (न) नहीं (नयन्ति) प्राप्त होते हैं (पशु) पशु के सदृश (मन्यमानाः) जानते हुए (वाजिना) घोड़े से (अवाजिनम्) घोड़े जिसमें नहीं ऐसे सङ्ग्राम को (न) नहीं (हासयन्ति) हराते हैं और (अश्वात्) घोड़े से (पुरः) प्रथम (गर्दभम्) लम्बे कानवाले गदहे को (न) नहीं (नयन्ति) प्राप्त कराते हैं उनको (सायकस्य) शस्त्रसमूह के दान से युक्त करने को आप (चिकिते) जानिये ॥२३॥

भावार्थ : वे ही राजा के वीर श्रेष्ठ होवें कि जो युद्धविद्या को जान के सेनाओं के अङ्गों की यथावत् रक्षा स्थिर करने और युद्ध कराने को जानते हैं ॥२३॥