Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 18 / 11

उ॒त मा॒ता म॑हि॒षमन्व॑वेनद॒मी त्वा॑ जहति पुत्र दे॒वाः। अथा॑ब्रवीद्वृ॒त्रमिन्द्रो॑ हनि॒ष्यन्त्सखे॑ विष्णो वित॒रं वि क्र॑मस्व ॥११॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 18 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रादिती | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब सन्तान शिक्षा से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। मा॒ता। म॒हि॒षम्। अनु॑। अ॒वे॒न॒त्। अ॒मी इति॑। त्वा॒। ज॒ह॒ति॒।। पु॒त्र॒। दे॒वाः। अथ॑। अ॒ब्र॒वी॒त्। वृ॒त्रम्। इन्द्रः॑। ह॒नि॒ष्यन्। सखे॑। वि॒ष्णो॒ इति॑। वि॒ऽत॒रम्। वि। क्र॒म॒स्व॒ ॥११॥

पदार्थ : हे (सखे) मित्र (विष्णो) सम्पूर्ण विद्याओं में व्यापक (पुत्र) दुःख से रक्षा करनेवाले ! आप (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्यवान् सूर्य्य के सदृश पालनकर्त्ता (वृत्रम्) मेघ के समान अविद्या का (हनिष्यन्) नाश करनेवाले हुए (वितरम्) विविध प्रकार तरने योग्य को (वि, क्रमस्व) पुरुषार्थी हूजिये (अथ) इसके अनन्तर (माता) माता (त्वा) आपको (महिषम्) बड़ा (अवेनत्) माँगती है, जो इस प्रकार (उत) भी जैसे पिता (अब्रवीत्) कहता है, वैसे नहीं करे तो (अमी) यह (देवाः) विद्वान् लोग आपका (अनु, जहति) त्याग करते हैं ॥११॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सन्तानों की योग्यता है कि जैसे विद्वान् माता पिता ब्रह्मचर्य आदि से विद्या का ग्रहण और शरीर के सुख के वर्धन का उपदेश करें, वैसे ही करना चाहिये और जो उत्तम शीलयुक्त पुत्र होते हैं, उन्हीं पर यथार्थवक्ता अध्यापक लोग कृपा करते और दुर्व्यसनियों का त्याग करते हैं ॥११॥