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Rigveda / 4 / 18 / 12

कस्ते॑ मा॒तरं॑ वि॒धवा॑मचक्रच्छ॒युं कस्त्वाम॑जिघांस॒च्चर॑न्तम्। कस्ते॑ दे॒वो अधि॑ मार्डी॒क आ॑सी॒द्यत्प्राक्षि॑णाः पि॒तरं॑ पाद॒गृह्य॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 18 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रादिती | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : कः। ते॒। मा॒तर॑म्। वि॒धवा॑म्। अ॒च॒क्र॒त्। श॒युम्। कः। त्वाम्। अ॒जि॒घां॒स॒त्। चर॑न्तम्। कः। ते॒। दे॒वः। अधि॑। मा॒र्डी॒के। आ॒सी॒त्। यत्। प्र। अक्षि॑णाः। पि॒तर॑म्। पा॒द॒ऽगृह्य॑ ॥१२॥

पदार्थ : हे पुत्र ! (ते) आपकी (मातरम्) माता को (विधवाम्) पतिहीन (कः) कौन (अचक्रत्) करता है (कः) कौन (चरन्तम्) विहार वा (शयुम्) शयन करते हुए (त्वाम्) आपको (अजिघांसत्) मारने की इच्छा करता है (कः) कौन (ते) आपके (देवः) श्रेष्ठ गुणवाला (मार्डीके) सुख करने में (अधि) सर्वोपरि (आसीत्) विराजमान हुआ है (पादगृह्य) हे पैरों को ग्रहण करने योग्य ! (यत्) जो आपके (पितरम्) उत्पन्न करनेवाले को (प्र, अक्षिणाः) नाश करता है ॥१२॥

भावार्थ : हे सन्तानो ! जो पुरुष वा स्त्रियाँ आप लोगों के पितरों का नाश करके माताओं को विधवा करें और आप लोगों का भी नाश करें, उनका विश्वास आप लोग न करिये ॥१२॥