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Rigveda / 4 / 38 / 3

यं सी॒मनु॑ प्र॒वते॑व॒ द्रव॑न्तं॒ विश्वः॑ पू॒रुर्मद॑ति॒ हर्ष॑माणः। प॒ड्भिर्गृध्य॑न्तं मेध॒युं न शूरं॑ रथ॒तुरं॒ वात॑मिव॒ ध्रज॑न्तम् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 38 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : दध्रिकाः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यम्। सी॒म्। अनु॑। प्र॒वता॑ऽइव। द्रव॑न्तम्। विश्वः॑। पू॒रुः। मद॑ति। हर्ष॑माणः। प॒ट्ऽभिः। गृध्य॑न्तम्। मे॒ध॒ऽयुम्। न। शूर॑म्। र॒थ॒ऽतुर॑म्। वात॑म्ऽइव। ध्रज॑न्तम् ॥३॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यम्) जिसको (सीम्) सब ओर से जल (प्रवतेव) नीचे स्थल से जैसे वैसे (द्रवन्तम्) जाते हुए को (अनु) पीछे (विश्वः) सब (हर्षमाणः) हर्षित होता हुआ (पूरुः) मनुष्यमात्र (मदति) आनन्दित होता है वह (मेधयुम्) हिंसा की कामना करते और (शूरम्) वीर पुरुष के (न) सदृश (ध्रजन्तम्) चलते हुए (वातमिव) वायु के सदृश (रथतुरम्) रथ के द्वारा शीघ्र चलनेवाले (पड्भिः) पैरों से (गृध्यन्तम्) अभिकाङ्क्षा करते हुए शत्रु के मारने को समर्थ होता है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जिस राजा के राज्य में नीचा स्थान जल के सदृश और सब प्रकार से गुणों का पात्र एक होता है, उसके समीप योग्य पुरुष रहते हैं ॥३॥