Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 38 / 4

यः स्मा॑रुन्धा॒नो गध्या॑ स॒मत्सु॒ सनु॑तर॒श्चर॑ति॒ गोषु॒ गच्छ॑न्। आ॒विर्ऋ॑जीको वि॒दथा॑ नि॒चिक्य॑त्ति॒रो अ॑र॒तिं पर्याप॑ आ॒योः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 38 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : दध्रिकाः | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यः। स्म॒। आ॒ऽरु॒न्धा॒नः। गध्या॑। स॒मत्ऽसु॑। सनु॑ऽतरः। चर॑ति। गोषु॑। गच्छ॑न्। आ॒विःऽऋ॑जीकः॒। वि॒दथा॑। नि॒ऽचिक्य॑त्। ति॒रः। अ॒र॒तिम्। परि॑। आपः॑। आ॒योः ॥४॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यः) जो (सनुतरः) सनातन विद्यायुक्त (समत्सु) संग्रामों में (गध्या) मिले हुए (आरुन्धानः) सब ओर से शत्रुओं को रोकता हुआ (आविर्ऋजीकः) प्रसिद्ध सरल अर्थात् कपटरहित स्वभाववाला (गोषु) पृथिवियों में (गच्छन्) चलता और (निचिक्यत्) देखता हुआ शत्रुओं का (तिरः) तिरस्कार और (अरतिम्) दुःख का निवारण करके (परि, चरति) घूमता है (आपः) जलों के सदृश (आयोः) अवस्था के (विदथा) विज्ञानों को प्राप्त होता है (स्म) उसी को आप अधिकारी करें ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो जन अपने राज्य में शान्ति करने, शत्रुओं के राज्य में भय देने और बलयुक्त, अधिक अवस्थावाले, प्रसिद्ध कीर्तियुक्त होवें, उन्हीं को शत्रुओं के जीतने के लिये नियुक्त करो ॥४॥