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Rigveda / 5 / 17 / 4

अ॒स्य क्रत्वा॒ विचे॑तसो द॒स्मस्य॒ वसु॒ रथ॒ आ। अधा॒ विश्वा॑सु॒ हव्यो॒ऽग्निर्वि॒क्षु प्र श॑स्यते ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 17 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : पुरुरात्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब अग्निदृष्टान्त से विद्याविषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒स्य। क्रत्वा॑। विऽचे॑तसः। द॒स्मस्य॑। वसु॑। रथे॑। आ। अध॑। विश्वा॑सु। हव्यः॑। अ॒ग्निः। वि॒क्षु। प्र। श॒स्य॒ते॒ ॥४॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जिसकी (विश्वासु) सम्पूर्ण (विक्षु) प्रजाओं में (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (अग्निः) अग्नि (प्र, शस्यते) प्रशंसा को प्राप्त होता है (अधा) इसके अनन्तर (अस्य) इसकी (क्रत्वा) बुद्धि तथा (विचेतसः) जनाने और (दस्मस्य) दुःख के नाश करनेवाले की बुद्धि से (रथे) सुन्दर वाहन में (वसु) द्रव्य (आ) प्रशंसित होता है ॥४॥

भावार्थ : जैसे प्रजा में अग्नि विराजता है, वैसे ही विद्या और विनय से युक्त बुद्धिमान् पुरुष शोभित होते हैं ॥४॥