Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 17 / 5

नू न॒ इद्धि वार्य॑मा॒सा स॑चन्त सू॒रयः॑। ऊर्जो॑ नपाद॒भिष्ट॑ये पा॒हि श॒ग्धि स्व॒स्तय॑ उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 17 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : पुरुरात्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिग्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : नु। नः॒। इत्। हि। वार्य॑म्। आ॒सा। स॒च॒न्त॒। सू॒रयः॑। ऊर्जः॑। न॒पा॒त्। अ॒भिष्ट॑ये। पा॒हि। श॒ग्धि। स्व॒स्तये॑। उ॒त। ए॒धि॒। पृ॒त्ऽसु। नः॒। वृ॒धे ॥५॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जैसे (सूरयः) विद्वान् जन (आसा) उपवेशन अर्थात् स्थिति से (नः) हम लोगों को और (वार्यम्) श्रेष्ठ पदार्थों में उत्पन्न बिजुलीरूप अग्नि को (सचन्त) सम्बद्ध करते हैं, वैसे (नपात्) नहीं गिरनेवाले आप (नः) हम लोगों के (अभिष्टये) अपेक्षित सुख के लिये (ऊर्जः) पराक्रमों की (पाहि) रक्षा कीजिये और (पृत्सु) संग्रामों में हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (हि) जिससे (शग्धि) समर्थ हूजिये और (स्वस्तये) सुख के लिये (नू) शीघ्र (इत्) ही (उत) निश्चय से (एधि) प्राप्त हूजिये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य विद्वानों के अनुकरण को करें तो उत्तम गुणों की प्राप्ति, बल की वृद्धि और सुखपूर्वक विजय को करते हैं ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्रहवाँ सूक्त और नववाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥