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Rigveda / 5 / 25 / 7

यद्वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो। महि॑षीव॒ त्वद्र॒यिस्त्वद्वाजा॒ उदी॑रते ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 25 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब अग्निपदवाच्य राजदृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। वाहि॑ष्ठम्। तत्। अ॒ग्नये॑। बृ॒हत्। अ॒र्च॒। वि॒भा॒व॒सो॒ इति॑ विभाऽवसो। महि॑षीऽइव। त्वत्। र॒यिः। त्वत्। वाजाः॑। उत्। ई॒र॒ते॒ ॥७॥

पदार्थ : हे (विभावसो) स्वयं प्रकाशित ! (यत्) जिस (वाहिष्ठम्) अतिशय प्राप्त करनेवाले का (अग्नये) राजा के लिये (बृहत्) बड़ा (अर्च) सत्कार करो (तत्) उसकी (महिषीव) बड़ी अर्थात् पटरानी के सदृश सेवा करो और जो (त्वत्) आपसे (रयिः) धन और (त्वत्) आपसे (वाजाः) अन्न आदि (उत्, ईरते) उत्तमता से उत्पन्न होते हैं, उनको हम लोग प्राप्त होवें ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता रानी अपने पति का निरन्तर सत्कार करती और उससे उत्पन्न हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होती है, वैसे ही मनुष्य विद्वानों का आदर करके उनसे उत्पन्न हुई अर्थात् उनके सम्बन्ध से प्रकट हुई बुद्धि को प्राप्त होकर निरन्तर सुखी हो ॥७॥