Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 25 / 8

तव॑ द्यु॒मन्तो॑ अ॒र्चयो॒ ग्रावे॑वोच्यते बृ॒हत्। उ॒तो ते॑ तन्य॒तुर्य॑था स्वा॒नो अ॑र्त॒ त्मना॑ दि॒वः ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 25 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वसुयव आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब मेघदृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : तव॑। द्यु॒ऽमन्तः॑। अ॒र्चयः॑। ग्रावा॑ऽइव। उ॒च्य॒ते॒। बृ॒हत्। उ॒तो इति॑। ते॒। त॒न्य॒तुः। य॒था॒। स्वा॒नः। अ॒र्त॒। त्मना॑। दि॒वः ॥८॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! (तव) आपके (द्युमन्तः) बहुत प्रकाशवाली (अर्चयः) किरणें हैं उनसे जो (ग्रावेव) मेघ के सदृश (बृहत्) बहुत सत्य (उच्यते) कहा जाता (उतो) और (ते) आपका (यथा) जैसे (तन्यतुः) बिजुली वैसे (स्वानः) शब्द वर्त्तमान है, इस कारण (त्मना) आत्मा से (दिवः) प्रकाशयुक्त पदार्थों को तुम सब लोग (अर्त्त) प्राप्त होओ ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ के सदृश गम्भीर शब्द से गूढ़ अर्थों के उपदेश देते और बिजुली के सदृश पुरुषार्थ करते हैं, वे सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त होते हैं ॥८॥