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Rigveda / 5 / 30 / 6

तुभ्येदे॒ते म॒रुतः॑ सु॒शेवा॒ अर्च॑न्त्य॒र्कं सु॒न्वन्त्यन्धः॑। अहि॑मोहा॒नम॒प आ॒शया॑नं॒ प्र मा॒याभि॑र्मा॒यिनं॑ सक्ष॒दिन्द्रः॑ ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 30 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : बभ्रु रात्रेयः | देवता : इन्द्र ऋणञ्चयश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तुभ्य॑। इत्। ए॒ते। म॒रुतः॑। सु॒ऽशेवाः॑। अर्च॑न्ति। अ॒र्कम्। सु॒न्वन्ति॑। अन्धः॑। अहि॑म्। ओ॒हा॒नम्। अ॒पः। आ॒ऽशया॑नम्। प्र। मा॒याभिः॑। मा॒यिन॑म्। स॒क्ष॒त्। इन्द्रः॑ ॥६॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जैसे (इन्द्रः) बिजुली (मायाभिः) बुद्धियों से (आशयानम्) चारों ओर शयन करते हुए (मायिनम्) निकृष्ट बुद्धिवाले और (ओहानम्) त्याग करते हुए (अहिम्) मेघ को (सक्षत्) प्राप्त होता और ताड़न करके (अपः) जलों को भूमि में गिराता है और जैसे (एते) ये (तुभ्य) आपके लिये (सुशेवाः) उत्तम सुखवाले (मरुतः) ऋत्विक् मनुष्य (अर्कम्) सत्कार करने योग्य का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं और (अन्धः) अन्न को (सुन्वन्ति) उत्पन्न करते हैं, वैसे (इत्) ही आपके लिये सम्पूर्ण विद्वान् जन सुख (प्र) देवें ॥६॥

भावार्थ : वे ही विद्वान् जन जगत् के सुख करनेवाले होते हैं, जो सूर्य्य और मेघ के समान जगत् के सुख करनेवाले हैं तथा अपने समान दूसरों के सुख करनेवाले होते हैं ॥६॥