Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 5 / 30 / 7

वि षू मृधो॑ ज॒नुषा॒ दान॒मिन्व॒न्नह॒न्गवा॑ मघवन्त्संचका॒नः। अत्रा॑ दा॒सस्य॒ नमु॑चेः॒ शिरो॒ यदव॑र्तयो॒ मन॑वे गा॒तुमि॒च्छन् ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 30 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : बभ्रु रात्रेयः | देवता : इन्द्र ऋणञ्चयश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब वीर विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वि। सु। मृधः॑। ज॒नुषा॑। दान॑म्। इन्व॑न्। अह॑न्। गवा॑। म॒घ॒ऽव॒न्। स॒म्ऽच॒का॒नः। अत्र॑। दा॒सस्य॑। नमु॑चेः। शिरः॑। यत्। अव॑र्तयः। मन॑वे। गा॒तुम्। इ॒च्छन् ॥७॥

पदार्थ : हे (मघवन्) धन और ऐश्वर्य से युक्त राजन् ! आप (जनुषा) जन्म से (दानम्) दान को (इन्वन्) प्राप्त होते हुए जैसे सूर्य्य (गवा) किरण से मेघ का (अहन्) नाश करता है, वैसे (मृधः) संग्रामों को जीतिये और (सञ्चकानः) उत्तम प्रकार कामना करते हुए जैसे (अत्रा) इस व्यवहार में सूर्य (नमुचेः) अपने स्वरूप को नहीं त्यागनेवाले (दासस्य) सेवक के सदृश वर्त्तमान मेघ के (शिरः) उत्तम अङ्ग का (वि) विशेष करके नाश करता है, वैसे आप (मनवे) विचारशील धार्मिक मनुष्य के लिये (यत्) जिस (गातुम्) भूमि वा वाणी की (इच्छन्) इच्छा करते हुए हो, उसके लिये शत्रु के शिर को (सु) उत्तम प्रकार (अवर्त्तयः) नाश करिये ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो ! जो सूर्य मेघ को जीत कर जगत् को सुख देता है, वैसे दुष्ट शत्रुओं को जीत कर प्रजाओं को सुख दीजिये ॥७॥