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Rigveda / 5 / 35 / 5

त्वं तमि॑न्द्र॒ मर्त्य॑ममित्र॒यन्त॑मद्रिवः। स॒र्व॒र॒था श॑तक्रतो॒ नि या॑हि शवसस्पते ॥५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 5 | Sukta : 35 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : प्रभूवसुराङ्गिरसः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

पदपाठ : त्वम्। तम्। इ॒न्द्र॒। मर्त्य॑म्। अ॒मि॒त्र॒ऽयन्त॑म्। अ॒द्रि॒ऽवः॒। स॒र्व॒ऽर॒था। श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो। नि। या॒हि॒। श॒व॒सः॒। प॒ते॒ ॥५॥

पदार्थ : (शवसः) बल अर्थात् सेना के (पते) पालक सेना के स्वामिन् ! (शतक्रतो) अमित बुद्धिवाले (अद्रिवः) मेघयुक्त सूर्य्य के सदृश राजमान (इन्द्र) ऐश्वर्य्य की इच्छा करनेवाले प्रजाजन ! (सर्वरथा) सम्पूर्ण वाहनों से युक्त (त्वम्) आप (तम्) उस (अमित्रयन्तम्) शत्रु के सदृश आचरण करते हुए (मर्त्यम्) मनुष्यशरीरधारी को विजय करने के लिये (नि) अत्यन्त (याहि) प्राप्त हूजिये ॥५॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो अन्याय से आपका शत्रु होवे, उसके शासन के लिये बल के सहित आप नित्य प्राप्त हूजिये ॥५॥